अनुरूपता-बिना सोंचें समझे भीड़ के अनुरूप चलने की मनहस्थिति

अनुरूपता  – महान मनोवैज्ञानिक रोलों मे ने एक अद्भुत किताब लिखी है उस किताब का नाम है मनुष्य की स्वयं की खोज – इस पुस्तक में उन्होंने कहा है , हमारे समाज में हौसले और साहस के विपरीत कायरता नहीं है बल्कि अनुरूपता है । यानी बिना सोंचें समझे भीड़ के अनुरूप चलने की मनहस्थिति ।

सफलता – सफलता का अर्थ है कि किसी महान लक्ष्य निर्धारित कर उस दिशा में आगे बढ़ना ।

एक आदमी पहले से लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ रहा है और वो जानता है कि उसे कहाँ जाना है तो वह आदमी सफल है ।और

जो आदमी ऐसा नहीं कर रहा है वो आदमी असफल है ।यानी सफलता निर्धारित लक्ष्य के तरफ़ आगे बढ़ना है ।


अधिकांश लोग वैसा ही कर रहे हैं जैसा दूसरे कर रहे हैं ।ये जाने- समझे बग़ैर की क्यूँ ।अनुरूपता एक भयंकर बीमारी बन कर उभर रही है । 

लगभग सात वर्ष की उम्र से पढ़ना सुरु कर देते हैं और लगभग पच्चीस के होते-होते हम रोज़ी- रोटी कमाना सुरु कर देते हैं ।साथ ही परिवार की देखभाल भी ।

लेकिन पैंसठ उम्र का  होने पे भी हम यह नहीं सिख पाते हैं कि हम की आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और निश्चिन्त कैसे हुआ जाए ? क्यूँ , क्यूँकि हम औरों के लिक पर चलते हैं ।

आप बस ठान लें अपने सपने को पूरा करने के लिए क्यूँकि अगर आप ठान लेते हैं ये ब्राह्मण भी आपकी मदद करना सुरु कर देता है ।

हर प्रश्न के उत्तर मिल जाएँगे ।आप महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं बस यह याद रखें अपना आत्म्छवि को ऊँचा और ऊँचा रखें ।अनुरूपता को त्याग करें ।

कोई एक विचार चुन लो, उसी को अपना जीवन बना लो, इसके बारे में सोंचों, उसका सपना देखो, उसके साथ जीयो । अपने दिमाग़ , मांसपेशियाँ, सनायु, शरीर के हर हिस्से को उस विचार से भर जाने दो, बाक़ी सभी विचारों को पीछे छोड़ दो । यही सफलता का रहस्य है इसी तरीक़े से आध्त्य्मिक महापुरुष उत्पन्न होते हैं ।

                           – स्वामी विवेकानन्द ।


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