डॉ स्टीफन हॉकिंग -एक संघर्ष भरी सच्चे हीरो की कहानी

डॉ स्टीफन हॉकिंग – प्रेरणा से भरा जीवन – आज के पोस्ट में हम इनके जीवनी के कुछ अंश ले रहा हुँ ।

 

डॉ स्टीफन हॉकिंग -एक संघर्ष भरी सच्चे हीरो की कहानी
डॉ स्टीफन हॉकिंग -एक संघर्ष भरी सच्चे हीरो की कहानी

डॉ स्टीफन हॉकिंग -एक संघर्ष भरी सच्चे हीरो की कहानी

आज के इस पोस्ट में हम बात करेंगे एक महान शख्सियत का जो की विश्व की विश्व की सर्वाधिक बिक्री होने वाली पुस्तक ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम के लेखक हैं ,

बताइये कौन ? गैलिलिओ ,न्यूटन एवं आइंस्टाइन के समकक्ष प्रतिभा का वैजानिक हैं ,उनका नाम बताइये ?

उनका नाम है-

डॉ स्टीफन हॉकिंग। एक संघर्ष भरी सच्चे हीरो की कहानी।

 

डॉ स्टीफन हॉकिंग का जन्म 8 जनवरी 1942 में और उनकी मृत्यु 14 मार्च 2018 में हुआ।


21 वर्ष की उम्र में ही दो मोटर न्यूरोजन डिजीज के शिकार हो गए जो की लकवे से भी खतरनाक बीमारी थी।

यह रोग व्यक्ति के शारीरिक शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करता रहता है। सभी अंग धीरे-धीरे कमजोर होते चले जाते हैं।

डॉ स्टीफन हॉकिंग 30 व्हील चेयर में कैद थे।

वे स्पीच सिन्थेसाजिर की मदद से बोलते हैं। जिसको उनके लिए एक विशेष कंपनी ने तैयार किया था।

भले ही व्हील पे हों ,अंग क्षीण हो गए थे लेकिन मानसिक शक्ति पे उनका हमेशा अधिपत्य बना रहा।

हॉकिंग ने आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत को कवान्टम सिद्धांत के साथ मिलाया एवं बताया की ब्रह्माण्ड की संरचना किस प्रकार हुई।

 

दोस्तों ,कितने आश्चर्य की बात की जिस व्यक्ति की शरीर की संरचना गड़बड़ा गई हो ,

वह व्यक्ति  ब्रह्माण्ड की संरचना की खोज कर रहा है।

समस्त विश्व में विज्ञान एवं ब्रह्माण्ड के रहस्य पर व्याख्या देने जाते हैं।

डॉ स्टीफन हॉकिंग – भारत आए थे –

जनवरी2001 में डॉ स्टीफन हॉकिंग भारत आये थे

 

तब टाइम्स ऑफ़ इंडिया वालों ने साक्षात्कार , ईश्वर डोर नहीं खींचता के के नाम से छापा था ,

जिसमें पत्रकार ने जब पूछा-आप बीमारी के बाद कैसा महसूस करते हैं उनके जवाब में उन होने कहा-

मैं जितना सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन जी सकूँ उतना प्रयत्न करता हूँ।

मुझे अपनी स्थिति की चिंता नहीं है। जो कार्य मैं कर नहीं सकता उसके लिए पछतावा भी नहीं है।

 

मैं होनी को स्वीकार कर सकता हूँ। अभिशाप को वरदान मान लिया।

 

बीमारी होते ही मैंने अपनी सीमित उम्र मान कर कार्य पर ध्यान दिया।

 

इससे मेरा मष्तिस्क एकाग्र हुआ व कार्य में तेजी आई।

बीमारी के पूर्व मेरा आज की उपेक्षा अच्छा नहीं था। तब मैं बोर होता था अव्यवस्थित जीवन जी रहा था।

अब मैं पहले की उपेक्षा अधिक अच्छा जीवन जीता हूँ एवं प्रशन्न हूँ।

 

डॉ स्टीफन हॉकिंग  को डॉक्टरों ने तो कह दिया था मैं 25 वर्ष से अधिक नहीं जी सकूंगा। जब बीमारी का पता चला मैं 21 वर्ष का था ,

 

उनके अनुसार मैं 4 वर्ष और जी सकता था। लेकिन आज 30 वर्ष हो गए ,मैं अपना कार्य कर रहा हूँ।

शायद यह मेरे आत्मविश्वास का चमत्कार है। तभी तो साक्षात्कार का शीर्षक था ,

ईश्वर के हाथ में डोर नहीं।

फिर आखिर यह डोर किसके हाथ में है ? हमारी डोर हमारे हाथों में है। यह है आत्मविश्वास।

 

 

डॉ स्टीफन हॉकिंग -एक संघर्ष भरी सच्चे हीरो की कहानी-


दोस्तों ,देखो ! उनकी सोंच। जब डॉ स्टीफन हॉकिंग अपनी बीमारी के उपरांत इतना कार्य कर सकते हैं तो आप और हम क्यों नहीं कर सकते हैं ?

क्या आपकी समस्या हॉकिंग से बड़ी है ?

कम से कम आपको बायोलॉजी ,आपका शरीर साथ दे रहा है।

उन्होंने बायोलॉजी को वश में किया -आत्मविश्वास के सहारे।

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धन्यवाद !

 

 

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