तरुण सागर जी कथा – Kadve pravachan

आपका बहुत- बहुत स्वागत है आपका KADVEPRAVACHAN.com पर । आज पढ़ेंगे नए और शानदार मुनीश्री तरुण सागर जी के कड़वे प्रवचन

तरुण सागर  जी कथा - Kadve pravachan
तरुण सागर जी कथा – Kadve pravachan

तरुण सागर जी की कथा – कुछ लोग कहते हैं की तरुण सागर  जी कथा में हंसाते हैं। मैं कहता हूँ अरे बाबा ! यह सत्संग हंसने के लिए है ?

 

प्रवचन सुनने के बाद रोना आना चाहिए की अब तक का मेरा जीवन यूँ ही खाने-पिने और सोने में चला गया।

कथा को सिर्फ सुनना नहीं बल्कि गुनना भी है। और फिर मैं कथा कहाँ ,मैं जीवन की व्यथा सुनाता हूँ।

तरुण सागर जी के कड़वे प्रवचन – 

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जिस घर को तुमने खून-पसीना एक करके बनवाया है।
तुम देखना एक दिन डंडा और कण्डा के साथ घर से बेघर कर दिए जाओगे।

मुझे तरुण सागर का निवेदन सिर्फ इतना है की डंडा और कण्डा के साथ

घर से बाहर निकाले जाओ या

फिर पिच्छी-कमण्डलधारी की सेवा में लग जाओ। कहिये !क्या ख्याल है ?

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जिंदगी में बदलाव जरुरी है।

सिर्फ दो लोग हैं जो कभी नहीं बदलते-एक तो मुर्ख और दूसरा मुर्दा।

अगर आप कहते हैं की आप जहाँ हैं वहां तो कोई नहीं पहुँच सकता है तो

इसका अर्थ हुआ की आप प्रमोशन नहीं चाहते।

सीडी और सड़क बैठने के लिए नहीं होती।

इन पर चलते रहना जरुरी है।

बदलाव का यह मतलब गतिशीलता।
पानी ठहर जाये तो गन्दा हो जाता है।

जीवन अगर ठहर जाए तो धुंधला हो जाता है।

 

तरुण सागर जी कथा-

 

गाय दूध देती नहीं है ,

दूध निकलना पड़ता है।

जीवन में महान कार्य स्वतः ही संपन्न नहीं होते,

उनके लिए प्रयास करना पड़ता है।

तरुण सागर जी कथा-

 

सम्मेदसिखर या वैषणवदेवी की यात्रा के लिए जब सत्तर साल की बड़ी माँ या सात साल का बच्चा ऊपर चढ़ता है तो उनकी नजरेंकेवल ऊपर रहती हैं।

वे तो निचे देखते हैं , पीछे।

संकल्प की शक्ति के दम पर ही वे बिना साँस खोये ऊपर चढ़ जाते हैं।

जिंदगी की विकास यात्रा को ऊंचाइयां प्रदान करने के लिए ऐसे ही दृढ़ संकल्प की जरूरत है।

तुम नदी में नहाते हो।

सैंकड़ों टन पानी तुम्हारे सर पर होता है लेकिन वजन मालूम नहीं पड़ता।

परन्तु जब घड़े में पानी को डालकर सर पर रखते हैं तो पानी भार हो  जाता है।

भार अपना मानने में है।

संसार में रहना पाप नहीं है ,लेकिन भोजन में भजन को भूल जाना पाप है।

चीजों को जरूरत के रूप  इस्तेमाल करो ,उन्हें विलासिता के रूप में इस्तेमाल करने की जरुरत नहीं है।

कड़वे वचन-मेरी वाणी कठोर हो सकती है ।

लेकिन ज़िंदगी जा सार इसी कठोर वाणी में है । तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे ज़ख्मों पर मरहम -पट्टी कर दूँ  और छोड़ दूँ ।

पर ऐसा नहीं करूँगा क्यूँकि यह ज़रूरी है ।बीमारी का लक्षण मिटाने से बीमारी नहीं मीटती ।

तुम्हें बुख़ार चढ़ा हो और ठंढे पानी में बैठ जाओ तो शरीर तो ठंढा हो जाएगा ।

साथ ही तुम भी ठंढे हो जाओगे ।

लक्षणों का इलाज नहीं करना है , बल्कि बीमारी का इलाज करना है ।

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