मन गांठें खोलो

आज के पोस्ट में एक शानदार कहानी जो की मैंने सूर्या सिन्हा के किताब कहानी बोलती है से लिया है ,कहानी का शीर्षक है – मन  गांठें खोलो

मन  गांठें खोलो -पुराने ज़माने की बात है। एक व्यापारी ऊंटों पर सामान लादकर शहर-शहर जाता और व्यापर करता। एक बार सामान बेचकर वह वापस अपने देश लौट रहा था रास्तें में रात हो गई वह एक सराए पर रुका।

सराए के बहार एक पेड़ के निचे व्यापारी अपने ऊंटों को बाँधने लगा। चार ऊंट बाँध दिए ,मगर पांचवे ऊंट के लिए रस्सी काम पड़ गई। जो ऊंट खड़ा था ,उसे इन्तजार था की मालिक भी उसे खूंटे से बांधेगा तो वह भी बैठकर जुगाली करे और थकन मिटायें ,मगर मालिक परेशान था। 
 कहीं ,रास्ते में खो गई थी अब ऊंट को बांधे कैसे ? यदि ना बंधा ऊंट तो दर था की ऊंट रात को कहीं चला ना जाये ,अब व्यापारी क्या करे !


जब कुछ ऊंट के मालिक को कुछ नहीं सुझा तो उसने सोंचा की क्यों ना सराय के मालिक से मदद मांगी जाये और यही सोंचकर आगे बड़ा तो उसने देखा की एक मस्तमौला फ़क़ीर सीधी पे बैठा हुआ था। वह काफी देर से व्यापारी को देख रहा था। व्यापारी करीब आया तो उसने पूछा की क्या परेशानी है ?

बाबा ऊंट की हिफाजत कैसे करूँ , एक ऊंट के लिए रस्सी काम पड़ गई है। 


फ़क़ीर हंसा ,मगर व्यापारी उसकी हंसी का अर्थ नहीं समझा – जैसे ही व्यापारी आगे  तो ,क्यूंकि वयापारी ने सोंचा की सराय के मालिक से रस्सी मांगू। 
इसकी कोई जरुरत नहीं है ,जाओ पांचवें ऊंट को वैसे ही बांधों जैसे चार ऊंट को बाँधा है। 
मगर रस्सी…… ?


मैंने कहा न , रस्सी की कोई जरुरत नहीं है ,तुम जाओ और सिर्फ बाँधने का अभिनय करो ऊंट को ऐसे लगे की सच में तुम रस्सी से बाँध रहे हो ,वह फिर कहीं नहीं जायेगा। 


वयापारी ने फ़क़ीर की बात मान ली और वापस जाकर वैसा ही जैसा की फ़क़ीर ने कहा था ,उसने कल्पना की रस्सी से बाँधने का अभिनय किया और कमल की बात यह थी की काल्पनिक रस्सी से बांधते ही वह ऊंट इत्मीनान से बैठ गया और जुगाली करने लगा अन्य ऊंटों की तरह ही।

सुबह हुई। व्यापारी को अब सफर में आगे वापस अपने देश निकलना था। उसने ऊंट भी हांका ,जिसे काल्पनिक रस्सी से बनवा वह ऊंट उठा ही नहीं बाकि सभी ऊंटों के रस्सी खोलते ही उठ खड़ा हुआ। 
उसने ऊंट को डंडे से पीटने लगा क्यूंकि ऊंट के अड़ियलपन पे बहुत गुस्सा आया ,ये उठ नहीं रहा है। 


तभी फ़क़ीर वहां आ गया -इस बेजुबान पर जुल्म क्यों कर रहे हैं ?


देखिये न बाबा ! यह कम्बख्त उठ ही नहीं रहा है  , यह उठेगा कैसे तुमने कल रात को काल्पनिक रस्सी इसके  था खोला तुमने ? 

अगर तुमने रात को रस्सी से नहीं बंधा होता कहीं चला जाता न ऊंट तुम्हारा ,हाँ बाबा पर मैंने तो सिर्फ अभिनय किया बांधने का। 

बिलकुल ठीक जैसे तुंमने बाँधने का अभिनय किया था उसी तरह खोलने का भी करो। व्यापारी ने ठीक वैसे ही खोला जैसे रात को काल्पनिक रस्सी से बंधा था ,उसने पेड़ से रस्सी खोलने और फिर उसके बाद ऊंट के गले से रस्सी खोलने का अभिनय किया। 


आश्चर्यजनक तरीके से ऊंट उठ खड़ा हुआ और अपने साथियों  से जा मिला। व्यापारी ने फ़क़ीर को देखा तो वह मुस्कुरा रहा था। 
जिस तरह यह ऊंट अदृश्य रस्सी  बंधा था और उठ नहीं रहा था , उसी तरह लोग रूढ़ियों से बंधे हैं

इसलिए एक ही जगह पर चलना चाहते हैं यह संसार इसलिए दुखी है और कास्ट में है ,क्यूंकि रूढ़ियों से बंधा है ,मन से बंधा है। 
यह कहकर फ़क़ीर चला गया और व्यापारी ुसवके शब्दों में छिपे गूढ़ रहस्य को समझने की कोसिस करने लगा। 
शिक्षा – इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है की –


हमारी असफ़लतों का मूल कारण यही है की हलोग मन से बंधे हैं। पुराणी और घिसी-पीती परम्परओं और रूढ़िवादी विचारों से बंधे हैं। इसलिए चल नहीं रहे हैं। घिसत रहे हैं। यह ऊंट भी ोइन्तेजार में है की रस्सी खोले कौन ?

सभी बंधे पड़े हैं काल्पनिक रस्सी के गांठों से। 
अपने मन से असफ़लता का काल्पनिक भय निकालो। कारण यह वह रस्सी है बांधे हुए हैं और आगे बढ़ें से रोक रही है ,उस रस्सी को तोड़ो और आगे बढ़ने के लिए कमर कस लो।

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