मुनिश्री तरुण सागर जी -कड़वे प्रवचन

मुनिश्री तरुण सागर जी -कड़वे प्रवचन में कहते हैं – मेरा कहा मानें तो आप अपने घर के सामने कचरा पेटी और दरवाज़े पर खूँटी ज़रूर गाड़कर रखिए ।

वह इसलिए की रात को जब आप दुकान आएँ तो बाहर का किच-किच का कचरा , कचरा पेटी में डाल दें और दिन भर के झंझटों को खूँटी पर टाँग दें और फिर तनाव-मुक्त होकर मुस्कुराते हुए घर में प्रवेश करें । एक बात तय है की काम पर जाओगे तो वहाँ कोई-ना कोई मुश्किल आनी है । पर उन मुश्किलों से तुम्हारी पत्नी एर बच्चों का क्या लेना-देना ?




लोग कहते हैं सप्ताह में सात वार होते हैं लेकिन मैं आठ वार कहता हूँ सप्ताह में । सोमवार से रविवार तक सात वार होते हैं लेकिन यह तो सप्ताह के सात वार हुए ।
मैं आठवाँ बताता हूँ वह है – परिवार ।

७ दिन मिलते हैं तो सप्ताह , ३० दिन मिलते हैं तो माह , १२ माह मिलते हैं तो साल बनता है ।
यही मेल-मिलाप परिवार के साथ भी लागू होता है । आज परिवार का मतलब हम-दो हमारे दो रह गया है ,
इसमें माँ-बाप नहीं आते ।
जबकि Faimly का अर्थ होता है –
F- father
A – and

M- -Mother
I- I
L – love ,
Y – you

 

मुनिश्री तरुण सागर जी -कड़वे प्रवचन

कभी तुम्हारे माँ-बाप डाँट दे तो बुरा नहीं मानना बल्कि सोचना – ग़लती होने पर माँ-बाप नहीं डाँटेंगे तो और कौन डाँटेंगे ?
और कभी छोटों से ग़लती हो जाए तो माफ़ कर देना यह सोंचकर की ग़लतियाँ छोटे नहीं करेगा तो कौन करेगा ?
भूल से मत घबराइए भूल उन्ही से होती है जो कोसिस करते हैं कुछ करने की ।




एक बार चलनी ने सुई से कहा- बहिन ! बुरा मत मानना । तुम इतनी छोटी हो फिर भी तुम में छिद्र है ।

चलनी की बात सुन, सुई मुस्कुराई और बोली – मेरी बड़ी बहन ! मुझे बड़ा आश्चर्य है की मेरा छोटा सा छेद रखे दिख गया और तू जो स्वयं छेदों से भरी है , इसका तुझे पता भी नहीं ।

हमारी ज़िन्दगी का भी यही हाल होता है । हमें दूसरों की थाली की इल्ली तो दिख जाती है लेकिन अपनी थाली की बिल्ली नहीं दिखती ।

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