पंचतंत्र की कहानी -मेहमान भगवान होता है

मेहमान भगवान होता है

मेहमान भगवान होता है- मंगलु  शिकारी बेचारा जंगल में अकेला खड़ा सोंच रहा था कि वह इस घने जंगल में अब किस से बातें करे कब तक अकेला खड़ा इधर-उधर पागलों भाँति जागता रहे । 

 

 

अकेलापन जब उसे सांप की भाँति डसने को आ रहा था की ऐसे में उसने एक कबूतरी को पकड़कर अपने पिंजरे में क़ैद कर लिया और सोंचने लगा की चलो एक से दो भले ।




उसी समय आकाश में काले बादल मँडराने लगे । बिजली चमकने लगी । बादल गरजने लगे और उसके आँधी- तूफ़ान भी आ गया इस आँधी- तूफ़ान ने पूरा जंगल को हिला कर रख दिया ।

शिकारी इस घने बारिस से बचने के लिए एक बहुत घने पेड़ के जड़ के नीचे छुप गया और बारिश का रुकने का प्रतीक्षा करने  लगा । 

 

जब बहुत देर बारिश ना रुकी तो वह पेड़ के जड़ के पास बैठ गया । लम्बे समय तक बारिश का रुकने का इंतजार करते करते भूख भी उसे ज़ोरों की लग गई थी । अब वह ईश्वर से प्रार्थना करने लगा की उसका खाने का प्रबंध कर दें । 

 

उसी वृक्ष के ऊपर एक कबूतर बैठा रो रहा था क्यूँकि उसकी पत्नी(कबूतरी) नहीं आइ थी । इस भयंकर तूफ़ान में उसकी कबूतरी ना जाने कहाँ होगी ? किस हाल में होगी । उसे सुना घर अच्छा नहीं लग रहा था ।




पिंजरे में बंद कबूतरी ने जब अपने पति की रोने की आवाज़ सुनी तो वह ज़ोर से बोली – मेरे अच्छे पति मैं आपके दुःख को समझ रही हूँ ,पर मैं क्या करूँ इस समय मैं शिकारी के पिंजरे में बंद हूँ और ये शिकारी हमारा शत्रु है ।

पर क्या करें यह हमारे घर पर आया है तो ऐसे में हमारा ये मेहमान है और इसकी सेवा तो करनी पड़ेगी । हमें इस समय शत्रुता को मन से निकाल देना चाहिए ।अपनी पत्नी की बातें सुनकर कबूतर का मन बहुत प्रसन्न हुआ ।

वह उसी समय वृक्ष से नीचे उतर कर आया और बोला- हे, परदेशी ! भले ही आप हमारे शिकारी हैं और हमारे शत्रु भी , परंतु आप हमारे अभी मेहमान हैं ।मैं आपकी हर प्रकार से सेवा करने की कोसिस करूँगा । मैं अपने हर साथियों की तरफ़ से आपका स्वागत करता हूँ ।

 

यह कहते ही कबूतर वहाँ से उड़ गया और ना जाने कहाँ से कुछ सूखे पत्ते और तिनके इकट्ठा कर लाया और ना जाने कैसे उन सूखे पत्तों में आग लगा दी । आग लगते हि शिकारी की सर्दी दूर हो गई ।

 

जिससे शिकारी बहुत ख़ुश हुआ । और उसने कबूतर के तरफ़ देख कर कहा मित्र- तुम वाक़ई में बहुत अच्छे हो ।

 

तुमने जो मेरे लिए कष्ट उठाएँ हैं ये शायद कोई मेरा सगा भी नहीं करता । आज तुमने ये सिद्ध कर दिया की अभी भी धर्म सबसे ऊँचा है ।




तुमने मेरे जैसे पापी, जिसने कभी किसी को सुख दिया ही नहीं , हाँ दुःख ज़रूर दिया हूँ , आज तुमने जीवन का सबसे बड़ा सबक़ दे दिया । शिकारी का ध्यान कबूतर की तरफ़ ना था वो तो पश्चात्ताप की आग में जल रहा था ।

 

 उसने अपना तीर- धनुष को आग में फेंक कर कहा – आज से मैं कभी किसी को तकलीफ़ नहीं पहुँचाऊँगा और ना ही शिकार करूँगा । मैं इस अग्नि को साक्षी मानकर क़सम खाता हूँ । 

 

जो आग कबूतर ने जलाई थी वो धीरे-धीरे बड़ती गई और चूँकि शिकारी को भूख लगा था ।कबूतर धीरे-धीरे वो उसी आग में चला गया और कहते हुए गया की – हे शिकारी आप मुझे खा कर अपनी भूख मिटा लेना ।जबतक कुछ शिकारी समझ पाता उस कबूतर को उस आग की लपट ने जला कर रख दिया ।

 

शिकारी को गहरा आघात लगा बहुत दुःखी हुआ । दुःखी शिकारी ने पिंजरे का मुँह खोलकर- कबूतरी से कहा – अब तुम जाओ तुम आज़ाद हो । 

 

कबूतरी पिंजरे से बाहर आकर बोली, हे मानव! अब इन बातों का समय बीत गया । यह कबूतर जो आग में जल गया मेरा पति था अब मैं अकेली जीकर क्या करूँगी । 

 

यह कहते हुए कबूतरी भी उसी आग में जल गई । शिकारी ख़ूब रोया पछताया , लेकिन अब सच में देर हो गई थी ।




 

सिख -यदि आप बुरे के लिए अच्छा काम करते रहे तो वह बुरा इंसान भी सुधर सकता है । घर आए हुए मेहमान को भगवान समझो और उनकी सेवा करो । तुम्हारा त्याग और प्यार अत्याचारी मन को भी बदल सकता है । 

 

 

 

 

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