सकारात्मक नज़रिया

सम्बंध ,सामर्थ्य ,नज़रिया ,नेतृत्व इन चार क्षेत्रों पर महारथ हासिल करने से कोई भी व्यक्ति सफल हो सकता है । लेकिन इन चार क्षेत्रों में मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरी लगा नज़रिया । तो मैंने सोंचा क्यूँ आपसे नज़रिया के बारे में बात किया जाए । 

 

 

जितनी जानकारी पिछले पाँच हज़ार सालों में उत्पन्न हुई है उस से अधिक जानकारी पिछले तीस वर्षों में उत्पन्न हो चुकी है । 

 

 

नज़रिया बहुत हि महत्वपूर्ण उनके लिए जो नेतृत्व कर रहे हैं अपने टीम का या करेंगे , क्यूँकि नज़रिया बहुत हि गहरा प्रभाव डालता है किसी कि ज़िन्दगी पर । नज़रिया किसी की ज़िंदगी में रंग भर सकता है ।

नज़रिया आपको बना सकता है और मिटा भी । 

नज़रिया आपके टीम का एक खिलाड़ी होता है । सकारात्मक नज़रिया किसी भी टीम की जितने ( सफलता) की गारंटी नहीं होती है लेकिन नकारात्मक ( ख़राब ) नज़रिया हारने ( असफलता) की गारण्टी होती है । 

 

विजेता का सम्बंध योग्यता से नहीं नज़रिया से होता है । दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस बात को मानना नहीं चाहते हैं और योग्यता को ही प्रतमिकता देते हैं जबकि बहुत योग्यता वाली टीम ख़राब नज़रिया के कारण हार जाती है ।

 

 

हम इसे ऐसे समझ सकते हैं :-

प्रतिभा + नज़रिया = परिणाम 

बेहतरीन टीम + सड़ा नज़रिया = बुरी टीम ।

बेहतरीन टीम + ख़राब नज़रिया = औसत टीम । 

बेहतरीन प्रतिभा + औसत नज़रिया = अच्छी टीम ।

बेहतरीन प्रतिभा + अच्छे  नज़रिये = बेहतरीन टीम । 

 

 

अगर बेहतरीन परिणाम चाहते हैं तो अच्छे सकारात्मक नज़रिया वाले खिलाड़ी चाहिए । दूसरों के सम्पर्क पर आने पर नज़रिया फैलता है । नज़रिया संक्रमक है । एक खिलाड़ी से दूसरे में फैलता है । टीम की कई चीज़ें संक्रमक नहीं होती है मसलन प्रतिभा, अनुभव और अभ्यास करने की इक्षाशक्ति ।

 

 

आपको याद रखना होगा की हम अपने आस- पास के लोगों से प्रभावित होते हैं और उनके नज़रिये से भी । हममें प्रभावित होने की प्रवृति होती है ।और उनलोगों की नज़रिया अपनाने की प्रवृति होती है जिनके साथ वो समय बिताते हैं ।

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प्रार्थना कैसे करें ?

प्रार्थना करते हुए पर्फ़ेक्शन की चिंता मत कीजिए । आप बस ईश्वर से बात कीजिए जैसे आप एक सच्चे मित्र से करते हैं ।यूँ भी उसको वह पता है , जो आप कहेंगे और वह भी जो आप नहीं कहेंगे ।
– पावर सूत्र – जीना है तो नियम तोड़ो ।



प्रार्थना को व्यक्तिगत जीवन में कैसे अपनाएँ :-

 

प्रार्थना स्नान करके करें ताकि आपको सुद्धता महसूस हो ।

 

एकांत में पाल्थी मारकर या वर्जाशन में बैठें ।

 

अपने ध्यान को दोनो आँखों के बीच तिलक लगाने की जगह पर केंद्रित करें ।

 

लगभग पाँच बार गहरी साँस लें और छोड़ें जिस से आपका मन और चित शांत होगा ।

 

फिर आपका प्रिय मंत्र का उच्चारण करें ।

प्रार्थना कभी भी सबसे ज़्यादा ताक़तवर दूसरों के लिए करते हैं तब होता है इसलिए दूसरों का मंगल कामना ज़रूर करें ।

 

ईश्वर की अब तक के अच्छे जीवनीकार आभार ज़रूर व्यक्त करें ।

 

ईश्वर को अपने लक्ष्यों के बारे में बताएँ और आशीर्वाद का आग्रह करें ।

 

जब भी आपका प्रार्थना ख़त्म हो तो अपने दोनो हथेलियों को आपस में रगड़कर आँखों पर चेहरे पर लगा लें ।फिर धीरे-धीरे आँखें खोलें ।

 

प्रार्थना के दौरान जितना कम व्यवधान हो , उतना हि बेहतर होगा क्यूँकि इससे आपका फ़ोकस बढ़ेगा । मोबाइल , म्यूज़िक , टी॰वी॰ आदि बिलकुल बंद रखें । माहौल जितना शांत होगा आपका प्रार्थना उतना ही ताक़तवर होगा ।

 

यह प्रार्थना जब आपको वक़्त मिलें तब कर सकते हैं ।

 

 

 

प्रभु तुम मुझे शक्ति दो ,
ख़ुद पर करूँ बिस्वास
मेरे लिए है ज़मीं
मेरे लिए आकाश

 

 

 

जो कुछ भी मैं ठान लूँ ,
पूरा मैं उसको करूँ
चाहे हो बाधा कोई ,
न मैं रुकूँ ना मैं डरूँ ।

 

 

उन सबको मेरा नमन,
जिनसे। यह जीवन मिला ,
गुरुजन और माता पिता ,
त्रुतियों को करना क्षमा ,

 

 

पाना है मुझको शिखर ,
ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ जहाँ
सपने मेरे बड़े ,
प्रभु रखना अपनी दया ..

 

 

 

दोस्तों आज का विषय बहुत ही शानदार है  लिया है पावर थिंकिंग किताब से जो की इस किताब के लेखक हैं उज्जवल पटनी जी । इस किताब के अंदर १६ सपथ पत्र दिए गए हैं ।जो आपका जीवन बदल कर रख देगा ।



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आप किस श्रेणी के हैं

आपको ईमानदारी से सोचना है कि आप किस श्रेणी में हैं और भविष्य में आप किस श्रेणी में जाना चाहते हैं ।




 

तीन भाई पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए शहर चले गए । संयोगवश तीनों को एक ही कम्पनी में नौकरी लग गई ।

 

कुछ दिनो के बाद जब उनके पिता गाँव से फ़ोन किया और तीनों पुत्रों की सैलरी पूछी । बड़े ने कहा – तीस हज़ार , मँझले भाई ने कहा – चालीस हज़ार , और सबसे छोटे भाई ने कहा – साठ हज़ार ।

पिता चकित हो गए क्यूँकि तीनों के पास एक ही डिग्री , एक ही कॉलेज से निकले थे और संयोगवश कम्पनी भी तीनों को एक हि मिली फिर सैलरी में इतना फ़र्क़ कैसे ?

अगले दिन वो गाँव से शहर आ गए और कम्पनी के मैनेजर से इसका कारण पूछा । तब मैनेजर ने कहा मैं आपको बताऊँगा नहीं आप स्वयं ही इसका कारण देखें ।

कम्पनी का मैनेजर ने बड़े पुत्र को बुलाया और कहा – पास ही समुद्र में एक जहाज़ में कुछ माल है , जिसकी नीलामी होने जा रही है ।तुरंत पता करो क्या माल है ? और यही कार्य अन्य दोनो भाइयों को दिया ।

सबसे बड़ा भाई १० मिनट बाद लौटकर चला आया और जानकारी दी कि जहाज़ में कपड़ा एर कुछ इलेक्ट्रोनिक सामान है । मैनेजर ने पूछा कैसे पता किया ? तब बड़े भाई ने कहा – मैंने अपने परिचित से फ़ोन करके पूछा है ।

मंझला भाई दो घंटे बाद लौटा उसने बताया जहाज़ में १०० टी॰वी॰ हैं , लगभग १० हज़ार मीटर कपड़ा है और ५०० कम्प्यूटर है । मैनेजर ने पूछा – टी॰वी॰चालू है या बंद । मंझले भाई ने कहा – मैंने इतने बारीकी से नहीं देखा ।

 

सबसे छोटा भाई शाम को लौटा उसने बताया – बॉस , जहाज़ में १०० टीवी हैं , जिसमें से ८० नए और बीस पुराने हैं और लगभग १० हज़ार मीटर कपड़ा है जो की ऊँचे दर्जे का सिल्क है । मैंने कुछ कपड़ा व्यापारियों से बात की है । वो हमें अच्छे भाव देने को तैयार हैं । पाँच सौ जापानी कम्प्यूटर हैं और पूरे नए हैं । मैं अपने साथ कुछ कम्प्यूटर साथ ले गया था वो लोग कम्प्यूटर हमसे ले लेंगे । हमारा पूरा माल निकल जाएगा । इस सौदे में लगभग १० लाख का मुनाफ़ा होगा । बेचने और ख़रीदने वाले तैयार हैं , बस आपका हाँ का इन्तज़ार है ।




इतना कहते ही मैनेजर ने मुस्कुरा कर पिता की ओर देखा । वहाँ बैठे पिता का उनके प्रश्न का जवाब मिल चुका था ।

संसार के अधिकांश लोग इन्हीं तीन श्रेणी में आते हैं । सबसे बड़े भाई वाली पहली श्रेणी वह है जिसे काम सौंपा जाए तो वह कभी ज़िम्मेदारी नहीं निभाता । इनसे काम करवाने के लिए इनके पीछे पड़ना पड़ता है ।

मँझले भाई वाली श्रेणी जितना कार्य सौंपा जाए बस उतना ही करते हैं । उसके आगे बिलकुल दिमाग़ नहीं लगते । ये अच्छे स्टाफ़ बन सकते हैं पर लीडर नहीं ।

छोटे भाई वाली तीसरी श्रेणी को हम प्रोआक्टिव श्रेणी कहते हैं । इस श्रेणी वाली व्यक्ति को काम सौंपा जाए तो ये अपनी पूरी ताक़त झोंक देते हैं । ये अधिकांशतःसफल होते हैं और इनमें लीडर्शिप होती है ।





 

 

 

 

 

 

 

 

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सबसे बड़ा मूर्ख

एक बार राजा अकबर ने सभा बुलाई और बीरबल से कहा - बीरबल तुम मुझे देश सभी मूर्खों की सूची चाहिए । साथ में मुझे यह भी जानना है कि सबसे बड़ा मूर्ख कौन ?

 

 

संयोग से जिस दिन राजा अकबर ने ये आदेश दिया था उसी दिन एक व्यापारी बहुत दूर अरब से आया था और आपे संग बहुत सारे अरबी घोड़े भी लाया था उसे बेचने के लिए ।

बादशाह को वो घोड़े बहुत पसंद आया और राजा अकबर उस व्यापारी के साथ का सौदा किया २०० घोड़े का । राजा अकबर ने उसे ख़ुश होकर १००० सोने की मुद्राएँ पेसगी दी । व्यापारी बहुत ख़ुश हुआ और राजा अकबर बहुत सी दुयायें देकर चला गया ।

 

 

कुछ दिनो के बाद बीरबल मूर्खों की सूची लेकर बादशाह के पास आया । बादशाह ने उस लिस्ट को जैसे ही देखा ग़ुस्से से लाल हो गए क्यूँकि उस लिस्ट में सबसे ऊपर में राजा अकबर का ही था और ग़ुस्से से पूछा - बीरबल यह क्या बदतमीज़ी है ? इनमें सबसे बड़ा मूर्ख मैं कैसे ? अभी बताओ नहीं तो मैं तुम्हारा सर को अभी धड़ से अलग कर दूँगा ।


 

बीरबल ने कहा - महाराज ग़ुस्ताखी माफ़ लेकिन आपने उस दिन घोड़े वाले व्यापारी को १००० सोने की मुद्राएँ पेसगी दी थी । जबकि आपको उसका ना पता ना नाम मालूम है फिर भी आपने उसे १००० सोने की मुद्राएँ पेशगी दे दी बिना उसके नाम पता जाने । अब आप ही बताइए की क्या यह मूर्खता पूर्ण कार्य नहीं है महाराज ?


यह समझ लेना चाहिए की वो व्यापारी १००० स्वर्ण मुद्राएँ लेकर चला गया है और अब वह लौट कर नहीं आएगा । तब राजा अकबर को अपनी ग़लती का अहसास हुआ पर उन्होंने कहा - अगर वह व्यापारी वापस आ गया तो ?

तब मैं आपका नाम काटकर उस व्यापारी का नाम सबसे ऊपर लिख दूँगा ।


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कनविंस की शक्ति

यदि आप कनविंस की शक्ति से लैश हो जाएँ तो हर क़दम जीत आपकी निश्चित होगी ।

कनविंस का सामान्य अर्थ होता है किसी को किसी बात को समझाना, विश्वास दिलाना , अपनी बात को सही ढंग से रखना ।

मोटिवेटेर, वक़ील , धर्मपराचारक, व्यक्ति , संगठन , पोलीस, फ़िल्में , पापा मम्मी से किसी चीज के रोता हुआ बच्चा इत्यादि अपने-अपने तरीक़े से कनविंस करने की कोसिस करते हैं ।

किसी की आँखें भी आपको कनविंस कर सकती हैं की उसमें घृणा के भाव हैं या प्रेम के । आपको किसी का चेहरा कनविंस कर सकता है ।



कनविंस एक शक्ति है , कनविंस जीत दिलाती है , कनविंस सफलता दिलाती है । कनविंस से आप नकरात्मकता को सकरात्मकता में बदल सकते हैं । आपके ऊपर गुस्साये हुए व्यक्ति को आप माफ़ी मँगवा सकते हैं ।

सही बात को सही शब्दों के माध्यम से रखी जाए तो लोग आप पर भरोसा करेंगे ।कनविंस की शक्ति आपके मस्तिष्क में हैं निकलें और इस्तेमाल करें । आपको यह भी याद रखना चाहिए की जो हो चुका है उसे वापस नहीं किया जा सकता है तो अब आगे क्या उसके बारे में सोचना हाई बुद्धिमानी है क्यूँकि बैलेन्स जीवन ही सफल जीवन है । जिसे जिन बाक़ी है ।




आपका कनविंस की शक्ति ना को हाँ में बदल सकता है जब आप यह याद रखेंगे की जीवन में रिजेक्शन तो अवश्य मिलेंगे पर इस से घबराए नहीं , आप प्रयास जारी रखें और आप रिजेक्शन को सिलेक्शन में बदल सकते हैं । जब भी जीवन और मन की परेशानी आए तो अपना व्यवहार ना बिगाड़ें और ना बिगड़ने दें और यदि परेशान हो तो तत्काल जवाब ना दें । मन का मूड सही होने का इंतज़ार जरें ताकि बाद में आपको अपने बोले हुए शब्दों पे शर्मिंदा ना होना पड़े या अफ़सोस ना हो ।

यदि जवान को बुद्धि का साथ मिला संयम के साथ तो आप किसी को भी कनविंस कर सकते हैं ।



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मंदिर का मूर्ति

kadve pravachan

किसी स्थान पर संगमरमर का एक विशाल  भव्य मंदिर था। संगमरमरके अतिरिक्त वहां किसी दूसरे पत्थर का प्रयोग किया नहीं गया था। मंदिर में भगवन की प्रतिमा भी संगमरमर की ही थी।

 

लोग आते जाते मंदिर के बगल में जुटे उतारते , भीतर जाकर फल-फूल ,धूप-दिए आदि से भगवन की पूजा करते ,श्रद्धा से उनके चरणों में सर रखते।

 

 

मंदिर के आँगन में फर्श था और जहां लोग जुटे उतारकर आते थे वहां लगा संगमरमर अक्सर सब देखता और दुःखी होता। वह सोंचता -ईश्वर का यह कैसा अन्याय है की मैं भी संगमरमर और वह मूर्ति भी संगमरमर की है। लोग मेरे मुँह पे जुटे उतारते हैं और उस भगवन के रूप में स्थापित संगमरमर को श्रद्धा से पूजते हैं, ऐसा अन्याय मेरे साथ क्यों ?

 

एक रात जब मंदिर में सन्नाटा छा गया। पूजारी आदि चले गए तो आँगन का संगमरमर उठकर मूर्ति के समक्ष गया और गुस्से से बोलै -मुझे तेरे भाग्य से ईर्ष्या होती है।

मूर्ति का संगमरमर मुस्कुराया और बोला – क्यों भाई , तुम व्यर्थ ही मुझसे ईर्ष्या करते हो हम तो एक ही जाती के हैं और हमारा रंग-रूप भी एक ही है।

यही तो मेरी ईर्ष्या का कारण  है – आँगन के संगमरमर ने कहा – जब हम एक ही जाति और एक ही रंग-रूप तो क्यों ईश्वर ने इतना भेदभाव किया की लोग मुझे रोंदते हैं और मेरे मुँह पर जूते खोलते हैं और तुम्हारी दूप-दिया दिखाकर तुम्हारी पूजा-अर्चना करते हैं तुम्हार सामने श्रद्धा से सर झुकाते हैं।

 

देखो मित्र इसमें बात भेदभाव की नहीं है मूर्ति का संगमरमर मुस्कुरा कर बोला -यह संसार का नियम है जो जितना दुःख पाता है संघर्षों से जूझता है , उसे उतना ही सुख मिलता है। क्या तुम्हें याद नहीं की मुझे और तुम्हें एक ही खदान से निकाला गया था और पहले तो तुम्हें ही मूर्तिकार ने मूर्ति का रूप देने के लिए चुना था पर तुम तो पहले ही हथोड़े के चोट पर टूट गए थे क्यूंकि तुम दर्द को बर्दास्त नहीं कर पाए थे जबकि तुम्हारे जगह पर मुझे चुना गया और महीनो तक मुझपर हथोड़े चलाये गए और मैं दर्द सहता रहा। मैं टूटा नहीं। यदि तुमने मेरी तरह चोटें खाये होते तो निसंदेह आज तुम भी पूजे जाते।

 

दोस्तों ,हम में से भी  बहुत सारे लोग बिना किये हुए कुछ ,बिना संघर्षों के सब कुछ पा लेना चाहते हैं। ऐसे लोग चोट नहीं खाना चाहते हैं पर सच्चाई ये है की वो जिंदगी भर उस से ज्यादा चोट कहते हैं जितना वो उस चोट से भागे  थे।

इस कहानी से शिक्षा हमें मिलती है-

सर का ताज बनने के लिए सोने को तपना पड़ता है।

जीवन में सुखों को पाने के लिए पहले सुखों का त्याग करना पड़ता है ,घोर संघर्ष करना पड़ता  जाकर सफलता का मीठा फल चखने को मिलता है।

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