निन्याबे का चक्कर

निन्याबे का चक्कर 

एक सेठ हवेली थी। बगल में एक गरब का छोटा सा घर थे। दोनों घर की औरतें जब आपस में  मिलती थीं तब एक दूसरे से पूछती थी की आज तुमने क्या रसोई में बनाया ?

सेठ की स्त्री कहती की आज तो पापड़ की सब्जी बनाई है अथवा दाल बनायी है। गरीब घर की स्त्री कहती की आज हलवा-पूड़ी बनाया है अथवा खीर बनायी है !

सेठ की स्त्री अपनी अपने पति से कहती थी हमलोग इतने पैसेवाले और हम इतना साधारण भोजन करते हैं और वो लोग इतने गरीब इतना सुंदर-सुन्दर पकवान कहते हैं ,कैसे ?

जीवन एक भेलपुरी है- KADVE PRAVACHAN

सेठ ने कहा की वो लोग अभी निन्याबे के चक्कर में नहीं पड़े हैं ,जब उनको निन्याबे का चक्कर लग जायेगा तब ऐसा नहीं होगा स्त्री ने पूछा की ये निन्याबे का चक्कर क्या होता है ?

सेठ ने कहा तुम देखती  जाओ !

दूसरे सेठ ने अपने स्त्री से कहा निन्यानबे रुपए लाओ। सेठ की स्त्री निन्यानबे रुपये लेकर आई ,सेठ ने उस  निन्यानबे रुपये को एक कपडे की  पोटली में बाँध दी और अपने स्त्री से कहा की रात में मौका देखकर यह पोटली उस गरीब के घर में फ़ेंक देना रात होने पर सेठ की स्त्री ने वैसा ही किया। 

सुबह होने पर गरीब आदमी को आँगन में एक पोटली दिखाई दी उसने उस पोटली को अपने कमरे में लेकर गया और खोला तो उसमें रुपये मिले। 

उसने बीस -बीस करके पांच जगह रख दिया और देखा की जो उसने पांच बिस रखें हैं उसमें से एक बीस में एक रुपया कम है ,सभी बीस को जब वह गईं रहा था तो निन्यानबे हो रहे थे।

 बार-बार गिना ,कई बार ,पर वह तो निन्यानबे ही हो रहे थे। पति-पत्नी ने विचार किया की दो-तीन दिन घर का खर्च कम करके एक रूपया अगर हमलोग बचा लेंगे तो निन्यानबे  पुरे सौ हो जायेंगे। 

और वैसा ही हुआ है चार दिन  उनलोगों ने एक रुपया  बचा लिया। अब  रुपये हो चुके थे। अब उन्होंने सोंचा हमने मात्र-दो तीन दिन में एक रुपया बचा लिया।

यदि पहले  तरफ धयान देते तो आजतक कितने पैसे जमा होते ! इतने दिन व्यर्त गवाएं अब ध्यान रखेंगे। कुछ दिन बीतने पर सेठ ने अपनी स्त्री से कहा की आज तुम गरीब के स्त्री पूछना की आज घर बनाया है ?

जब  आपस  तो सेठ की स्त्री ने पूछा की आज तुमने घर में क्या बनाया ? उसने कहा-चटनी पीस ली है ,उसके साथ रोटी खा लेंगे। 

सेठानी अब समझ में आ गया निन्याबे का चक्कर !

RELATED POST-

मंदबुद्धि शेर

मन गांठें खोलो

इच्छा 

बाज का अंडा

positive shareing
0Shares

जीत का रहस्य

नेपोलियन की जीत का रहस्य 

आधी रत बिट चुकी थी। अपनी शिविर में नेपोलियन गहरी नींद में था। अचानक आपातकाल की घंटी बजी। तत्क्षण नेपोलियन की आँखें खुली और उठ कर बैठ गया। 

तभी हड़बड़ाए हुए सेनापति उनके कक्ष में आये 

नेपोलियन ने  पूछा -क्या बात है ?

महाराज जिस पडोसी को हम अपना मित्र समझते थे ,उसी ने हमारे ऊपर हमला कर दिया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा ऐसे में क्या करना चाहिए क्यूंकि हम मित्र -देश की तरफ से पूरी तरह निश्चिंत थे ,इसलिए हमने कोई रणनीति भी नहीं बनाई है। 

नेपोलियन की जीत का रहस्य
pick taken from google

“तुम निश्चिंत थे सेनापति लेकिन नेपोलियन कभी भी निश्चिंत नहीं था ,और वो कभी बेखबर नहीं रहता है। यह ठीक है की वह हमारा मित्र है ,लेकिन मित्रता की बुनियाद कितनी मजबूत है ,यह देखना  होता है।

मुझे  संदेह था की भविष्य में विश्वासघात हो सकता है ,इसलिए मैंने इस स्थति से निपटने के लिए पहले से रणनीति बना रखा है। मेज पर रखे उस नक्से को देखो और चिन्हित किये गए ठिकानों पर मोरच्बंदु करके हमला करो। जीत आज भी हमारी ही होगी। “

सेनापति तेजी से मेज की और दौड़ कर पंहुचा और नक़्शे तरफ देखा ,और नक़्शे का अध्यन करने लगा। 

सेनापति को आश्चर्यचकित देखकर नेपोलियन मुस्कुराया और बोला -विचारसील लोग अच्छी से अच्छी आशा करते हैं ,किन्तु बुरी से बुरी परिस्थति के लिए भी तैयार रहते हैं। 

जिस बात की कल्पना नहीं थी ,नेपोलिया को पहले अंदेशा था। उसने मित्र समझे  के विरुद्ध ठोस रणनीति बना राखी थी। कारण था नेपोलियन हमेसा विजता रहता था। और इस युद्ध में भी नेपोलियन ही जीता। 

इस कहानी नेपोलियन की जीत का रहस्य  से  शिक्षा मिलती है –

जो सदैव चौकन्ने ,सतर्क और जागे रहते ,उन्हें  कोई नहीं हरा सकता। 

नेपोलियन की दूरदर्शिता और सूझबूझ ने ही उसे विजेता बनाया। 

जीवन संग्राम में मित्रों को शत्रु और शत्रुओं को मित्र बनते देर नहीं लगती ,अतः व्यक्ति को नेपोलियन की भांति हर स्थिति के लिए स्वयं को पहले से तैयार रखना चाहिए। 

सफलता के नसे में चूर होकर लापरवाह नहीं हो जाना चाहिए। 

जीत का रहस्य-सफलता पाना बड़ी बात है पर सफलता को बरकरार रखना उससे भी बड़ी और अहम् बात है।

Related post –

एक लड़की की जीवन बदल देने वाली कहानी  

सफल लोगों के अनमोल वचन 

करसन भाई पटेल

यह कहानी मैंने सूर्या सिन्हा जी के किताब कहानियां बोलती से लिया है उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आया होगा। 

positive shareing
0Shares

मन गांठें खोलो

आज के पोस्ट में एक शानदार कहानी जो की मैंने सूर्या सिन्हा के किताब कहानी बोलती है से लिया है ,कहानी का शीर्षक है – मन  गांठें खोलो

मन  गांठें खोलो -पुराने ज़माने की बात है। एक व्यापारी ऊंटों पर सामान लादकर शहर-शहर जाता और व्यापर करता। एक बार सामान बेचकर वह वापस अपने देश लौट रहा था रास्तें में रात हो गई वह एक सराए पर रुका।

सराए के बहार एक पेड़ के निचे व्यापारी अपने ऊंटों को बाँधने लगा। चार ऊंट बाँध दिए ,मगर पांचवे ऊंट के लिए रस्सी काम पड़ गई। जो ऊंट खड़ा था ,उसे इन्तजार था की मालिक भी उसे खूंटे से बांधेगा तो वह भी बैठकर जुगाली करे और थकन मिटायें ,मगर मालिक परेशान था। 
 कहीं ,रास्ते में खो गई थी अब ऊंट को बांधे कैसे ? यदि ना बंधा ऊंट तो दर था की ऊंट रात को कहीं चला ना जाये ,अब व्यापारी क्या करे !


जब कुछ ऊंट के मालिक को कुछ नहीं सुझा तो उसने सोंचा की क्यों ना सराय के मालिक से मदद मांगी जाये और यही सोंचकर आगे बड़ा तो उसने देखा की एक मस्तमौला फ़क़ीर सीधी पे बैठा हुआ था। वह काफी देर से व्यापारी को देख रहा था। व्यापारी करीब आया तो उसने पूछा की क्या परेशानी है ?

बाबा ऊंट की हिफाजत कैसे करूँ , एक ऊंट के लिए रस्सी काम पड़ गई है। 


फ़क़ीर हंसा ,मगर व्यापारी उसकी हंसी का अर्थ नहीं समझा – जैसे ही व्यापारी आगे  तो ,क्यूंकि वयापारी ने सोंचा की सराय के मालिक से रस्सी मांगू। 
इसकी कोई जरुरत नहीं है ,जाओ पांचवें ऊंट को वैसे ही बांधों जैसे चार ऊंट को बाँधा है। 
मगर रस्सी…… ?


मैंने कहा न , रस्सी की कोई जरुरत नहीं है ,तुम जाओ और सिर्फ बाँधने का अभिनय करो ऊंट को ऐसे लगे की सच में तुम रस्सी से बाँध रहे हो ,वह फिर कहीं नहीं जायेगा। 


वयापारी ने फ़क़ीर की बात मान ली और वापस जाकर वैसा ही जैसा की फ़क़ीर ने कहा था ,उसने कल्पना की रस्सी से बाँधने का अभिनय किया और कमल की बात यह थी की काल्पनिक रस्सी से बांधते ही वह ऊंट इत्मीनान से बैठ गया और जुगाली करने लगा अन्य ऊंटों की तरह ही।

सुबह हुई। व्यापारी को अब सफर में आगे वापस अपने देश निकलना था। उसने ऊंट भी हांका ,जिसे काल्पनिक रस्सी से बनवा वह ऊंट उठा ही नहीं बाकि सभी ऊंटों के रस्सी खोलते ही उठ खड़ा हुआ। 
उसने ऊंट को डंडे से पीटने लगा क्यूंकि ऊंट के अड़ियलपन पे बहुत गुस्सा आया ,ये उठ नहीं रहा है। 


तभी फ़क़ीर वहां आ गया -इस बेजुबान पर जुल्म क्यों कर रहे हैं ?


देखिये न बाबा ! यह कम्बख्त उठ ही नहीं रहा है  , यह उठेगा कैसे तुमने कल रात को काल्पनिक रस्सी इसके  था खोला तुमने ? 

अगर तुमने रात को रस्सी से नहीं बंधा होता कहीं चला जाता न ऊंट तुम्हारा ,हाँ बाबा पर मैंने तो सिर्फ अभिनय किया बांधने का। 

बिलकुल ठीक जैसे तुंमने बाँधने का अभिनय किया था उसी तरह खोलने का भी करो। व्यापारी ने ठीक वैसे ही खोला जैसे रात को काल्पनिक रस्सी से बंधा था ,उसने पेड़ से रस्सी खोलने और फिर उसके बाद ऊंट के गले से रस्सी खोलने का अभिनय किया। 


आश्चर्यजनक तरीके से ऊंट उठ खड़ा हुआ और अपने साथियों  से जा मिला। व्यापारी ने फ़क़ीर को देखा तो वह मुस्कुरा रहा था। 
जिस तरह यह ऊंट अदृश्य रस्सी  बंधा था और उठ नहीं रहा था , उसी तरह लोग रूढ़ियों से बंधे हैं

इसलिए एक ही जगह पर चलना चाहते हैं यह संसार इसलिए दुखी है और कास्ट में है ,क्यूंकि रूढ़ियों से बंधा है ,मन से बंधा है। 
यह कहकर फ़क़ीर चला गया और व्यापारी ुसवके शब्दों में छिपे गूढ़ रहस्य को समझने की कोसिस करने लगा। 
शिक्षा – इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है की –


हमारी असफ़लतों का मूल कारण यही है की हलोग मन से बंधे हैं। पुराणी और घिसी-पीती परम्परओं और रूढ़िवादी विचारों से बंधे हैं। इसलिए चल नहीं रहे हैं। घिसत रहे हैं। यह ऊंट भी ोइन्तेजार में है की रस्सी खोले कौन ?

सभी बंधे पड़े हैं काल्पनिक रस्सी के गांठों से। 
अपने मन से असफ़लता का काल्पनिक भय निकालो। कारण यह वह रस्सी है बांधे हुए हैं और आगे बढ़ें से रोक रही है ,उस रस्सी को तोड़ो और आगे बढ़ने के लिए कमर कस लो।

post related – 

असली या नक़ली 

सहर का सबसे अमीर आदमी जॉन रॉकफेलर 

positive shareing
7Shares

बाज का बच्चा

एक घने जंगल में एक बार एक बाज का अंडा किसी तरह जंगली मुर्गी के अण्डों के बिच चला गया और बाकि बाकि अण्डों के साथ मिला गया ,चूँकि अंडे तो सभी सामान होते हैं क्या मुर्गी और क्या बाज। 

जैसे मुर्गी अपने अन्य अंडे का सेवा कर रही थी वैसे ही उसने बाज के अंडे का भी सेवा किया और कुछ दिनों के बाद समय आने पर अंडा फूटा। 

सभी अण्डों से चूजे निकले और बाज के अंडे से भी चूजा निकला। बाज का बच्चा यह अंडे से निकलने के बाद यह सोंचता हुआ बड़ा हुआ की वह एक मुर्गी है।

बाज का बच्चा भी वही काम करते जो अन्य मुर्गी के बाचे करते थे। जैसे अन्य बच्चे जमीन खोदकर अनाज के दाने चुगता और मुर्गी के बच्चे की तरह चूं-चूं करता था।

जब बच्चे खेल-खेल में कुछ फिट तक उड़ते थे और बाज का बच्चा भी वही कोसिस करता था और वह भी कुछ फिट तक उड़ता था।

एक बार की बात है जब बाज का बच्चा उन मुर्गी के बच्चे और मुर्गी के साथ जंगल में अपने दिनचर्या में लगे थे तभी सभी ने आकाश में एक बाज को उड़ते हुए देखा और उन्होंने देखा की बाज आकाश में कुलांचे भर भर रहा था ,मंडरा रह था। 


बाज का बच्चा  ने पूछा माँ इस सुब्दर सी चिडयां का क्या नाम है ? मुर्गी ने कहा – उस सुन्दर चिड़िया का नाम है बाज। फिर उस बच्चे ने -बाज के बच्चे ने पूछा -माँ क्या मैं भी इस बाज की तरह ही उड़ सकता हूँ ? बाज ने कहा-कभी नहीं ! तुम मुर्गी हो और मुर्गी उस बाज की तरह नहीं उड़ सकते हो। 

उस बाज के बच्चे ने बिना सोंचे-विचारे इस बात को मान लिया और विडंबना देखिये की वह बाज का बच्चा ने मुर्गी के बिच में रहकर मुर्गी की तरह जिया और मुर्गी की तरह ही वह मर गया।

सोंचने की क्षमता न होने के कारन वह विरासत को खो बैठा। कितना बड़ा नुकसान हुआ। वह जितने के लिए पैदा हुआ था , पर वह दिमागी रूप से हार के लिए तैयार हुआ।

Moral -अधिकतर लोगों के लिए यही बात सच है। जैसा की ओलिवर बेंडहाल होम्स ने कहा है – हमारे जिंदगी का दुर्भाग्यपूर्ण पहलु यह है की ज्यादातर लोग मन में कुछ करने की इक्षा लिए ही कब्र में चले जाते हैं।

हम अपनी ही दूरदर्शिता की कमी के कारण से ही बेहतरी हासिल नहीं कर पाते हैं।

हमें यह बात हमेशा याद रखना चाहिए आप भी एक बाज हैं और आप उड़ने के लिए पैदा हुए हैं ,जब कोई काम अन्य कोई कर सकता है ,सफल हो सकता है तो आप क्यों नहीं।

Related Post-

अपमान आपका पीछा करती है ।

एक लड़की की जीवन बदल देने वाली कहानी

उठना सीखो

धन्यवाद दोस्तों ,

आज का पोस्ट मैंने लिया है जित आपकी किताब से जिसके लेखक है –शिव खेड़ा। अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया हो तो प्लीज शेयर जरूर करें। सच में आप मेरी बात को मानकर इस किताब को जरूर पड़ें। 


positive shareing
0Shares

असली या नक़ली

एक राजा के पास एक व्यक्ति आया और बोला – राजा साहब मुझे काम चाइए । तब राजा ने पूछा तुम क्या कर सकते हो ? क्या तुम्हारे अंदर कुछ गुण हैं ?उस व्यक्ति ने जवाब दिया – राजा साहब मैं कुछ ही दिनो में यह बता सकता हूँ की कोई भी चीज के बारे में की यह असली या नक़ली ।

 

राजा उसकी बात से प्रभावित होकर उसे नौकरी पे रख लिया और उसे नौकरी दी अस्तबल में घोड़ों की देखरेख को ।वह व्यक्ति बहुत दिल से उन घोड़ों की सेवा करने लगा ।

 

 

कुछ महीने बीतने के बाद एक दिन अचानक से राजा आया और पूछा उस व्यक्ति और भाई – क्या ख़याल इन घोड़ों के बारे में ? और यह घोड़ा कैसा है जिसे मैंने सबसे महँगे दाम पे ख़रीदा है , जो सबसे ख़ास घोड़ा है मेरा ।यह असली नस्ल का है या नक़ली ?

 

 

उस व्यक्ति ने जवाब दिया राजा साहब – यह घोड़ा जिसे आपने इतने महँगे दाम पे आपने ख़रीदा तो है पर यह असली नस्ल का घोड़ा नहीं है ।

 

राजा चौंक गया और पूछा कैसे ?यह तो आप उन्हीं से पूछो जिससे आपने यह घोड़ा ख़रीदा है ।

 

राजा ने उस घोड़े बेचने वाले को बुलवाया और पूछा – हाँ भाई सच बता क्या यह घोड़ा नक़ली है ? और बिलकुल सच बताना ।

 

वह व्यक्ति घबरा गया राजा की बातों से ।और बोला – राजा साहब जान सलामती की दुआ करता हूँ आपसे और यह सच है ये असली नस्ली घोड़ा नहीं है ।बचपन में ही इसकी माँ मर गई थी, तो इसे हमने पाला था गाय और भैंसों के बीच में ।

 

राजा को बहुत उस आश्चर्य हुआ और उस व्यक्ति को दरबार में बुलाया और पूछा – तुम्हें कैसे बात पता चली की यह घोड़ा असली नस्ल का नहीं है ।

 

तब उस व्यक्ति ने कहा – राजा साहब कोई भी घोड़ा घास खाते समय अपनी गर्दन को ऊपर करके खाता है, जबकि यह घोड़ा तो अपनी गर्दन नीचे करके खाता था ।

 

अब तो राजा उसके  काम से बहुत ख़ुश हुआ और राजा ने बहुत सारे मुर्ग़ी , अंडे और बहुत भेड़- बकरियाँ उसे दान में दे दिया ।

 

राजा उस व्यक्ति के जवाब से बहुत ख़ुश हुआ और उसे उन्नति देकर रानी के महल में नौकरी दे दी ।कुछ दिनों के बाद राजा जब रानी के महल में आया तो राजा ने उस व्यक्ति से पूछा क्यूँ रानी के बारे में क्या ख़याल है। ये असली हैं या नक़ली ?

 

व्यक्ति ने कहा – हुजूर जान की माफ़ी चाहिए ,

राजा ने कहा – हाँ दी । और बोलो ।

राजा साहब रानी भी नक़ली है । राजा के तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई । उसने पूछा कैसे ? राजा साहब ये तो आप इनके माँ-पिता से ही पूछो ।

 

राजा ने रानी के माँ को बुलवाया तो रानी के माँ ने कहा – जी हुजूर रानी भी नक़ली है । बचपन में ही जो लड़की हमारी हुई थी उसे बहुत तेज़ बुखार आया और बहुत उसे। बचाने की कोसिस किया हमलोगों ने लेकिन वह नहीं बची , जिस राजकुमारी के साथ बचपन में ही आपका विवाह हुआ था ।

 

हमलोग बहुत डर गए की अब क्या करें सो हमने एक नौकरानी की लड़की को गोद ले लिया और यह वही नौकरानी की लड़की है ।

अब तो राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ पर उसके काम से बहुत ख़ुश हुआ और राजा ने बहुत सारे मुर्ग़ी , अंडे और बहुत भेड़- बकरियाँ उसे दान में दे दिया ।

राजा ने उसे अपने पास रख लिया उसकी उन्नति हो गई । कुछ दिनो के बाद राजा ने फिर पूछा कि तुम काफ़ी दिनो से मेरे साथ हो तुम्हारा क्या ख़याल है ? मैं असली हूँ या नक़ली ।

तब फिर उस व्यक्ति ने बोला – हुज़ूर जान की सलामती का वरदान चाहिए तब ही बोल पाउँगा ,

हाँ दिया जान की सलामती  – राजा ने कहा ।

हुज़ूर माफ़ करें आप भी नक़ली है ?

राजा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई पूछा कैसे ?

आप तो अपने माँ – पिता से पूछिए ।

राजा ने अपने माँ- पिता से पूछा तो उन्होंने बताया कि पड़ोसी राजा के डर से हमने आपका परवरिश एक भेड़ पालने वाला गदेड़िया के यहाँ पर करवाया । और आपका बचपन वही उसी भेड़ पालने वाले के पास बिता ।

राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ – तुम्हें कैसे पता चला ?

महाराज आप यदि असली महाराज होते तो आप किसी काम से ख़ुश होते तो हीरे देते , जवाहरत देते , ज़मीन देते । लेकिन आप तो जब भी ख़ुश होते हमारे काम से तो आप भेड़- बकरियाँ , अंडे मुर्ग़ी दान में देते थे ।

सिख –

positive shareing
0Shares

जॉन रॉकफेलर- शहर का सबसे अमीर आदमी

 एक व्यापारी अपने व्यवसाय में पूरी तरह से क़र्ज़ में डूब गया था। एक बार वह व्यापारी उदास होकर एक बगीचे में बैठा-बैठा अपने बिज़नेस को लेकर चिंतित था की अब तो व्यापार बंद हो जायेगा और यह सोंचकर बहुत निराश था,और सोंच रहा था की काश कोई कंपनी को बंद होने से बचा ले।

 

तभी एक बूढ़ा आदमी उसके पास आकर उसके बेंच पे बैठ गया और उस उदाश व्यापारी की तरफ देखकर बोला-आप बहुत चिंतित लग रहे हैं ,क्या आप अपनी समस्या बता सकते हैं मुझे ? शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ ?

 

व्यवसायी ने अपनी समस्या उस बूढ़े व्यक्ति को सुनाई और व्यवसायी की समस्या सुनकर बूढ़ा व्यक्ति ने अपनी जेब से चेक बुक निकाला और एक चेक पे अपना दस्तखत करके उस व्यवसायी को दे दिया और कहा-तुम यह चेक रखो ,एक वर्ष बाद हम यहाँ फिर मिलेंगे तो तुम मुझे पैसे वापस लौटा देना। 

 

व्यवसायी ने चेक देखा तो उसकी आंख्ने फटी रह गई – उसके हाथ 50 लाख का चेक था जिस पर उस सहर का सबसे अमीर आदमी जॉन रॉकफेलर के साइन थे। 

 

उस व्यवसायी को विस्वास नहीं हो पा रहा था की वह बूढ़ा आदमी  नहीं बल्कि उस शहर का सबसे अमीर आदमी जॉन रॉकफेलर था। 

 

वह अपने चेक के ऊपर से नजर हटाया और फिर से उस आदमी के तरफ देखना चाहा तबतक वह व्यक्ति जा चूका था। व्यवसायी बहुत खुस था अब उसकी साडी चिंताएं समाप्त हो गई है और अब वह इन पैसों से अपने व्यवसाय को फिर से खड़ा कर देगा। 

 

लेकिन उसने निर्णय किया की वह चेक को तभी इस्तेमाल करेगा जब उसे इसकी बहुत जरुरत होगी और उसके पास कोई और दूसरा उपाय या रास्ता नहीं होगा। 

 

उस व्यक्ति की निराशा और चिंताएं दूर हो चुकी थी। अब वह निडर होकर अपने व्यवसाय को नए आत्मविश्वास के साथ चलाने लगा क्यूंकि उसके पास 50 लाख रुपये का चेक था जो जरूरत के समय वह इस्तेमाल कर सकता था सकता था। 

 

उसने कुछ समय में ही कुछ अच्छे व्यापारियों के साथ अच्छे समझौते किये जिससे धिरे-धीरे उसका व्यवसाय फिर से अच्छा चलने लगा और उसने उस चेक का इस्तेमाल किये बिना अपना सारा क़र्ज़ चूका दिया और अपने व्यापार में भी सफल हो गया। 

 

ठीक एक वर्ष बाद वह व्यवसायी वही चेक लेकर उस बगीचे में जा पहुंचा जहाँ एक वर्ष पहले वह बूढ़ा आदमी उससे मिला था। 

 

वहां उसे वह बूढ़ा आदमी मिला,व्यवसायी ने चेक वापस करते हुए कहा-धन्यवाद आपका आपने बुरे समय में मेरी मदद की। आपने इस चेक को देकर इतनी हिम्मत दी की मेरा व्यवसाय फिर से खड़ा हो गया और मुझे इस चेक का उपयोग करने की कभी जरुरत ही नहीं पड़ी। 

वह अपनी बात पूरी करता तभी वहां पर पास ही के पागलखाने से कुछ कर्मचारी आ पहुंचे और उस बूढ़े आदमी को पकड़कर पागल खाने ले जाने लगा। 

 

यह देखकर व्यवसायी ने कहा-यह आप क्या लार रहे हैं ?आप जानते हैं यह कौन हैं ?

 

यह इस शहर के सबसे अमीर व्यक्ति जॉन रॉकफेलर है। 

 

पागलखाने के कर्मचारी ने कहा-यह तो पागल है जो खुद को जॉन रॉकफेलर समझता है। यह हमेशा भागकर इस बगीचे में आ जाता है और लोगों से कहता है की वह इस शहर का मशहुर व्यक्ति जॉन रॉकफेलर है। हमें लगता है की इसने आपको भी बेवकूफ बनाया होगा। 

 

वह व्यव्सायी पागलखाने के कर्मचारी की बातें सुनकर सुन्न हो गया। उसे यकीं नहीं पा रहा था की वह व्यक्ति जॉन रॉकफेलर नहीं था। और एक वर्ष जिस चेक के दम पर वह आराम से अपने व्यवसाय में जोखिमें उठा रहा था वह नकली चेक था। 

 

वह काफी देर सोंचता रहा ,फिर उसे समझ में आया की वह उस पैसे के दम पर उसने अपना व्यवसाय वापस खड़ा किया है बल्कि यह तो निडरता और आत्मविश्वास था जो उसके भीतर ही था। 

 

RELATED POST-

एक पालतू तोते की कहानी

हार के आगे जीत की कहानी

 

 

शिक्षा – हमारे भीतर समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति निहित है और जिसके दम पर हम कुछ भी कर सकते हैं लेकिन समस्या यह की हम कभी-कभी नकरात्मकता ,निराशा और डर के अन्धकार में इतना डूब जाते हैं की हम भूल जाते हैं अपने क्षमतओं और ताकतों को। 

 

हमारे भीतर असीमित शक्ति है जो अन्धकार को पल भर में दूर कर सकती है। जब हम आत्मविश्वास और निडरता का रास्ता चुनते हैं तो सारी रुकावटें खत्म हो जाती हैं। 

positive shareing
3Shares

इच्छा

इच्छा इच्छा – सफल होने के लिए प्रेरणा किसी मकसद को हासिल करने की गहरी इच्छा से जन्म लेती है। इच्छा बहुत ही जरुरी तत्व है सफलता के लिए। नेपोलियन हिल ने भी लिखा है -इंसान का दिमाग जिन चीजों को सोंच सकता है,  पर यकीं कर सकता है ,उन्हें हासिल भी कर सकता है। 

 

 

आखिर सफलता के लिए इच्छा कैसा होना चाहिए ?  छोटा सा कहानी बताने जा रहा हूँ। 

 

एक यूवक सुकरात ( जो की बहुत ही सफल व्यक्ति थे ) से सफलता का रहस्य पूछा ? सुकरात ने उस युवक से अगर आप सफलता का रहस्य जानना चाहते हैं कल सुबह  नदी के किनारे मिलना। दूसरे दिन युवक सुकरात से मिलने नदी के किनारे सुबह-सुबह पहुँच गया ,अभी सूर्य की लालिमा आने को थी। 

सुकरात ने उस युवक को बोला की आप मेरे पीछे-पीछे आओ और वो खुद नदी के अंदर धीरे-धीरे जाने लगे। सुकरात पानी के उस तल तक नहीं पहुँच गए जहाँ पे पानी उनके गर्दन तक पहुंच रहा था और उस युवक के भी पानी उसके गर्दन डूबने तक था।

 

तो अचानक से सुकरात पीछे मुड़कर अचानक युवक सर पानी  दिया। युवक पानी से निकलने  छटपटाने लगा वो बहुत जोर से अपने हाथ पैर को चलाने लगा की कैसे सुकरात के चंगुल से बच जाएँ। लेकिन चूँकि सुकरात ताकतवर थे और शरीर से हट्टे-कट्टे थे तो युवक विफल रहा छुड़ाने में। 

 

सुकरात ने उस युवक को पानी में डुबोये रखा। युवक का शरीर नीला पड़ने लगा, तब सुकरात ने उसका सर को पानी से बाहर निकाला ,उस युवक का सर जैसे ही पानी से बाहर आया उस युवक ने सबसे पहले गहरे-गहरे सांस लेने लगा बिना कुछ बोले। जब थोड़ शांत हुआ सबकुछ तो उस युवक ने पूछा -ऐसा क्यों किया आपने ?

 

 

सुकरात ने पूछा -जब तुम पानी के अंदर थे तो तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज की जरुरत थी ? युवक ने जवाब दिया – हवा की 

 

सुकरात ने कहा- सफलता का यही रहस्य है। जब तुम्हें सफलता हासिल करने की वैसी ही तीव्र इच्छा होगी जैसी की पानी के अंदर हवा के लिए हो रही थी , तब तुम्हें सफलता मिल जाएगी। 

 

गहरी इच्छा हर उपलब्धि की शुरुआती बिंदु होती है। जिस तरह छोटी सी आग की लपटें अधिक गर्मी नहीं दे सकती ,वैसे ही कमजोर इच्छा बड़े नतीजे नहीं दे सकती। 

 

MOTIVATIONAL LINE-

 

आप लक्ष्य तक न तो किनारे खड़े रहकर पहुँच सकते हैं, और न ही धारा के साथ बहकर। आपको कभी हवा के साथ ,तो कभी हवा के विपरीत नाव खेनी होगी ,लेकिन उसे लगातार खेते रहना होगा। 

 

 

Related post-

नवान कैसे बने 

जोश में असीम ताक़त है

पालतू तोते की कहानी

 

 

positive shareing
1Shares

जादुई घंटी

जादुई घंटीएक नदी के तट पर एक बहुत सुन्दर गाँव था। गांव के लोग मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते थे। उस गॉंव में रामु नाम का गरीब चरवाहा था। वो आपकी मधुर आवाज के लिए प्रसिद्ध था,वो हर दिन गाना गाकर गाँव के सभी भेड़-बकरियाँ चराने पास के जंगल में ले जाता था।

 

जंगल में स्थित एक पर्वत था और उसकी चोटी पर एक विशाल पेड़ था। रामु इस पेड़ की छावों में गाना गाता और रामु सारी भेड़-बकरियाँ पे नजर रखता था। शाम होते ही रामु वापस गांव आ जाता था और सभी भेड़-बकरियाँ को गांव के सभी लोगों को सौंप देता था।

 

दिन भर कड़ी धुप में भेड़-बकरियाँ को चराने के लिए उसे हर घर से एक सिक्का मिलता था। ये सिक्का को रामु घर ले जाता था और अपने भाई और माँ का भूख मिटाता था ,क्यूंकि जो सिक्के कमाकर लाता था उसके कारण वो घर के लिए जरुरी चीजें ला पाता था,लेकिन छोटा भाई का अच्छा खाना खाने का दिल करता था वो हर दिन रुखा-सूखा खाकर ऊब चूका था।

 

यह बात रामु समझता था लेकिन वह कर भी क्या सकता था ? अगले सुबह उठकर फिर से वह भेड़-बकरियाँ चराने फिर से जंगल के चोटी पर पहुंचा तो उसने देखा की एक लकड़हारा उस पेड़ को काट रहा था जिसके निचे वह बैठकर भेड़-बकरियाँ चराता था। वह चिंतित हो गया। लेकिन वह एक तरकीब लगाया – अरे लकड़हारा भाई क्या तुम्हें नहीं पता है की इस पेड़ को श्राप है की कोई भी इस पेड़ को कटेगा तो इसमें बैठा चुड़ैल उस पे जा बैठेगा।

 

यह सुनकर लकड़हारा भाग खड़ा हुआ। लकड़हारा के भागते ही उस पेड़ की आत्मा प्रकट हुई और बोला-तुमने मेरी जान बचाई है इसलिए मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ और तुम्हें उपहार के रूप में एक घंटी देता हूँ। रामु कहता है की मैं इस साधारण घंटी का क्या करूँगा ?

 

 यह साधारण सी घंटी दिख रही है पर ये जादुई घंटी है।  इससे तुम जो चाहो खाने के लिए मंगा सकते हो। लेकिन बस ध्यान रखना की दिन भर में  सिर्फ एक बार ही मंगवा सकते हो। 

 

रामु बहुत खुस हुआ और वो सोंचते हुए की अब कोई भूखा नहीं सोयेगा साथ ही छोटे को जो चाहिए होगा उसे खाने के लिए मिलेगा। 

 

शाम को जब घर पहुंचा घर पे माँ को छोटे भाई को सारी घटना बताया। उसकी माँ और भाई बहुत खुस हुए और उनलोगों ने उस जादुई घंटी को आदेश दिया और जो चाहिए जी भर  और सो गया। 

 

अगले सुबह उठकर रामु भेड़-बकरियों को लेकर चला गया जब वापस शाम  घर पहुंचा तो उसने देखा सभी बर्तन खली पड़े  हैं उसके लिए बस रूखी-सुखी रोटी है जो वो रोज खाता था। यह देखकर रामु गुस्से से कुछ नहीं खाया और सो गया। 

 

अगले सुबह वो अपने साथ ले गया जादुई घंटी को। इधर घर पे जब माँ और छोटे भाई को बहुत भूख लग गई तो उनलोगों ने उस घंटी को बहुत ढूंढा ,पुरा घर तलाश लिया पर वो घंटी नहीं मिली।  वो लोग बहुत उदास हुए उनलोगों ने सोचा शायद घंटी गुम हो गई है और अब घंटी नहीं मिलेगा। आखिर वो लोग भूखे ही सो गए।

 

शाम को जब रामु वापस आया तो रामु ने अपने जेब से घंटी निकाली और उसे जो चाहिए था उसने जादुई घंटी से मंगवा कर खा लिया। यह सब कुछ देखकर माँ और छोटे भाई को बहुत दुःख हुआ। छोटा भाई बहुत रोने लगा और कहने लगा-भाई आप स्वार्थी हो गए हो। आप पहले ऐसे नहीं थे। 

 

RELATED POST-

निशा टीचर 

अपमान आपका पीछा करती है 

 

 

छोटे भाई को रोते और माँ को उदास देखकर रामु को गलती का अहसास हो गया। वो जिंदगी में कभी स्वार्थी नहीं बनेगा ,उसने प्रण लिया। 

सिख – हमें इस कहानी से सिख मिलती है की दुनिया कुछ भी करे पर हमें स्वार्थी नहीं बनना चाहिए। 

positive shareing
0Shares

निशा टीचर

एक समय की बात है एक स्कूल में एक प्ले टीचर जिनका नाम निशा टीचर था। वो अपनी पहली नौकरी में पहली क्लास को लेकर बहुत उत्साहित थी ।वो चाहती थी कि उनकी पहली क्लास बहुत अच्छी हो ।

 

वो अपने क्लास बहुत उत्साहित होकर गई और बच्चों को चेक करने के मक़सद से कुछ सवाल पूछे तो सभी बच्चे ने बढ़चर उत्तर दिया , लेकिन एक विद्यार्थी चिंटू जो बहुत होशियार था और हर सवाल का उत्तर दे रहा था । तो मैडम ने कहा- सबास चिंटू तुम तो बहुत होशियार हो ।

 

सभी बच्चे चिंटू के हाज़िर-जवाबी को देखकर बहुत ख़ुद हो रहे थे और चिंटू से दोस्ती भी करना चाह रहे थे ।तभी कक्षा समाप्त होने की घंटी बजती है ।

 

अभी निशा टीचर बोल हाई रही थी की चिंटू उठ खड़ा होता है और जल्दी से बाहर जाने लगता है , निशा टीचर चिंटू को पकड़ने के लिए पीछे दौड़ती हैं लेकिन वो चिंटू तो दरवाज़े से बाहर ना जाकर वो दीवार की तरफ़ दौड़ता हुआ दीवाल में ही ग़ायब हो जाता है । यह देखकर बच्चे और निशा टीचर दंग रह जाते हैं ।

 

बच्चे बहुत ज़्यादा घबरा जाते हैं । एक लड़की जो चिंटू के साथ बैठी वो बहुत ही ज़्यादा डर जाती है और मैडम से पूछती है – क्या चिंटू जो दीवाल में समा गया वो भूत था।

 

यह देखकर- सुनकर निशा टीचर बेहोश हो जाती है ।सभी बच्चे पहले से घबराए हुए थे अब बच्चे और ज़्यादा घबरा जाते हैं लेकिन उनमें से एक बच्चा मैडम के चेहरे पर पानी की छींटे मारता है ।

 

जब निशा टीचर को होस आता है तो वो उठकर स्टाफ़ रूम में जाती है और इस भूत वाले घटना को सभी स्टाफ़ से कहती हैं ।सभी स्टाफ़ से एक टीचर बोल उठा – हाँ मैंने भी देखा है जब स्कूल ख़ाली हो जाता है तो कुछ बच्चों के खेलने कूदने और बात करने की आवाज़ें आती हैं ।ये वो बच्चे हैं जिनकी मृत्यु स्कूल में हुई है और जिन्हें किसी ने देखा भी नहीं है ।

 

यह सुनकर अब निशा टीचर घबरा जाती अब उन्हें यह समझ नहीं आता है की वो अब क्या करे ।वो सींचती है की मेरी पहली नौकरी की पहली क्लास ही भूतिया थी , क्या अनुभव है हुआ ? मुझे अब समझ नहीं आ रहा है की अब क्या करूँ स्कूल में नौकरी करूँ या नहीं ।नहीं मैं इस तरह स्कूल की नौकरी नहीं छोड़ूँगी क्यूँकि बाक़ी लोग भी तो स्कूल आते हैं ।मुझे भी हिम्मत दिखानी होगी ।

 

अगले दिन वो हिम्मत जुटा कर स्कूल आइ तो देखा की आज चिंटू क्लास में नहीं आया है तो निशा टीचर को राहत महसूस हुई । कुछ दिन तक सब ठीक चलता रहा लेकिन एक दिन जब वो स्टाफ़ रूम में अकेली बैठी थी तो उन्हें कुछ आहट सुनाई दी ।उन्होंने इधर-उधर देखा लेकिन उन्हें कोई नज़र नहीं आया ।

 

मैडम अपने काम में फिर व्यस्त हो गई लेकिन थोड़ी देर के बाद निशा टीचर को पुकारा , जब निशा मैडम मुड़ी तो सामने चिंटू खड़ा था ।और बहुत जयदा डर गई ।

 

चिंटू बोला – डरिए मत मैडम , मैं आपको डराने नहीं , बल्कि आपसे बात करने आया हूँ ।पर तुम तो एक भूत हो और भला भूत को क्या बात करनी है तुम दूर रहो मुझसे – निशा टीचर बोली ।

 

चिंटू बोला- भला एक स्टूडेंट की बात अगर टीचर नहीं सुनेगी तो कौन सुनेगा ? यह कहकर चिंटू रोने लगा ।चिंटू को रोता देखकर मैडम को दया गई तो मैडम ने हिम्मत जुटाकर कहा – ठीक है कहो क्या बात है ?

 

चिंटू बोला – मैडम मुझे भी पड़ने-लिखने का बहुत शौक़ है , मैं भी पढ़ना चाहता हूँ लेकिन मैं जिस भी क्लास में जाता हूँ बच्चे डर जाते हैं । यह सुनकर निशा टीचर को बहुत हैरानी हुई ।

हले ये बताओ तुम्हारी मृत्यु कैसी हुई ? – निशा टीचर ने पूछा । चिंटू बोला – एक बार लंच ब्रेक में ,मैं अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था की तभी सीढ़ियों से गिर गया और नीचे लगे लोहे के रोड से मेरा सर टकरा गया और मेरी मृत्यु हो गई जिससे मेरी पड़ने की इक्षा अधूरी रह गई ।

 

अगर आप अपनी कक्षा में बैठने दें तो मैं भी पढ़ सकूँगा ।

 

चिंटू की बातें सुनकर निशा टीचर की घबराहट ख़त्म हो जाती है और चिंटू का ना पढ़ पाने का दर्द देखकर दया आ जाती है ।मैं तुमको पढ़ाऊँगी लेकिन रक शर्त है की तुम एक साधारण बच्चे की तरह रहोगे ।तब चिंटू बोला – इसका हल है मेरे पास , आज से मैं सिर्फ़ आपको ही दिखूँगा ।और आप ही सिर्फ़ मेरी अवाज सुन पाएँगी ।

 

यह ठीक रहेगा इससे तुम पढ़ भी सकोगे और बाक़ी बच्चे डरेंगे भी नहीं ।लेकिन तुम्हें कुछ पूछना हो तो तुम लिखकर देना ।और अकेले में पूछना । क्यूँकि अगर मैं सबके सामने बात करूँगी तो सब मुझे पागल समझेंगे ।

 

 

positive shareing
0Shares

आख़िरी शब्द

एक परिवार के बुज़ुर्ग व्यक्ति अपनी अंतिम साँस को गिन रहे थे लग रहा था कि अब गए की तब गए लेकिन मरते-मरते वो भून-भुनाना सुरु किया लेमन, लेमन लेमन । कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था कि दादा जी अचानक से लेमन-लेमन क्यूँ कर रहे हैं और वही उनके आख़िरी शब्द थे ।

 

उनके आख़िर शब्द लेमन बोलने के आगे और कुछ भी बोल नहीं पाए और वो इस दुनिया से चले गए । वो परिवार काफ़ी सम्पन्न परिवार था उन्होंने उस बुज़ुर्ग व्यक्ति की धूम-धाम विदाई की और चूँकि उनके दादा जी के आख़िरी शब्द लेमन था उन्होंने बहुत सारे लेमन दान में दिया । उनके शैया पे भी लेमन चढ़ाया ।

उनके अंतिम विदाई के बाद भी उस परिवार के मन में शंका थी आख़िर दादा जी आख़िरी शब्द लेमन क्यूँ था ? लेकिन उनके जाने के बाद उन लोगों ने ( परिवार वाले ) उस घर को बेचने का फ़ैसला किया और एक बिल्डर को बुलाकर घर को बेच दिया ।




बिल्डर उस घर को तोड़कर वहाँ पे एक बहुमंज़िला इमारत खड़ी करना चाहता था । सो उस बिल्डर ने काम सुरु किया और उस मकान को तोड़कर नींव के लिए वहाँ पे खुदाई किया । जान बिल्डर ने खुदाई का काम सुरु किया तो वहाँ से बहुत बड़ा एक ख़ज़ाना मिला । जिसमें हीरे- जवाहरत और बहुत सारे सोने के सिक्के के पेटियाँ ।

उस घर के पडोशी को बात जब पता चली तो उन्होंने उस घर के मालिक को संदेशा भिजवाया । जब वो घरवाले ने उस ख़ज़ाने पर अपना हक़ जताया तो उस बिल्डर ने उस ख़ज़ाने को देने से इंकार कर दिया । बिल्डर ने साफ़ कहा – मैंने प्रॉपर्टी ख़रीदी है , अब इसमें से जो निकले उस मालिक मैं हुआ ।

उस परिवार ने उस बिल्डर पे केस किया लेकिन फ़ैसला भी उस बिल्डर के हक़ में आया । केस के दौरान ही बिल्डर ने उस परिवार को बताया की , मैंने एक लेमन tree को जब उखाड़ तो उसी के नीचे ख़ज़ाना मिला था ।

उस परिवार के पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन निकल गई क्यूँकि वो परिवार उसी लेमन tree के नीचे क्रिकेट खेलता था , उस लेमन tree से निम्बू तोड़ता था । लेकिन अब क्या वो जा चुका था ।




दोस्तों इसी तरह से ख़ज़ाना हमारे अंदर हमारे हृदय में छुपा है । बहुत क़ीमती आपके अंदर है ख़ज़ाना जिसे किसी ने खोजा नहि है । आप खोज सुरु करो । आज से क्यूँकि आपके जैसा पूरी दुनिया में कोई नन्हीं है ।

positive shareing
0Shares

सबसे बड़ा मूर्ख

एक बार राजा अकबर ने सभा बुलाई और बीरबल से कहा - बीरबल तुम मुझे देश सभी मूर्खों की सूची चाहिए । साथ में मुझे यह भी जानना है कि सबसे बड़ा मूर्ख कौन ?

 

 

संयोग से जिस दिन राजा अकबर ने ये आदेश दिया था उसी दिन एक व्यापारी बहुत दूर अरब से आया था और आपे संग बहुत सारे अरबी घोड़े भी लाया था उसे बेचने के लिए ।

बादशाह को वो घोड़े बहुत पसंद आया और राजा अकबर उस व्यापारी के साथ का सौदा किया २०० घोड़े का । राजा अकबर ने उसे ख़ुश होकर १००० सोने की मुद्राएँ पेसगी दी । व्यापारी बहुत ख़ुश हुआ और राजा अकबर बहुत सी दुयायें देकर चला गया ।

 

 

कुछ दिनो के बाद बीरबल मूर्खों की सूची लेकर बादशाह के पास आया । बादशाह ने उस लिस्ट को जैसे ही देखा ग़ुस्से से लाल हो गए क्यूँकि उस लिस्ट में सबसे ऊपर में राजा अकबर का ही था और ग़ुस्से से पूछा - बीरबल यह क्या बदतमीज़ी है ? इनमें सबसे बड़ा मूर्ख मैं कैसे ? अभी बताओ नहीं तो मैं तुम्हारा सर को अभी धड़ से अलग कर दूँगा ।


 

बीरबल ने कहा - महाराज ग़ुस्ताखी माफ़ लेकिन आपने उस दिन घोड़े वाले व्यापारी को १००० सोने की मुद्राएँ पेसगी दी थी । जबकि आपको उसका ना पता ना नाम मालूम है फिर भी आपने उसे १००० सोने की मुद्राएँ पेशगी दे दी बिना उसके नाम पता जाने । अब आप ही बताइए की क्या यह मूर्खता पूर्ण कार्य नहीं है महाराज ?


यह समझ लेना चाहिए की वो व्यापारी १००० स्वर्ण मुद्राएँ लेकर चला गया है और अब वह लौट कर नहीं आएगा । तब राजा अकबर को अपनी ग़लती का अहसास हुआ पर उन्होंने कहा - अगर वह व्यापारी वापस आ गया तो ?

तब मैं आपका नाम काटकर उस व्यापारी का नाम सबसे ऊपर लिख दूँगा ।


positive shareing
0Shares

चुनाव आपका है


चुनाव आपका है

इस पृथ्वी पर कोई भी व्यक्ति आपको बिना आपकी अनुमति के छोटा या तुच्छ अनुभव नहीं करा सकता । ईश्वर आपको प्यार करता है – चाहे आपको यह पसंद हो या ना हो ।




जापानी लोग एक पेड़ लगाते हैं ।इसे बोनसाई पेड़ कहते हैं । यह सुंदर होता है और त्रुटि हीन रूप से बना होता है हालाँकि इसकी ऊँचाई इंचो में नापी जाती है । कैलिफ़ोर्निया में हम विशाल वृक्षों का जंगल पाते हैं जिसे सिकवयोश कहते हैं ।

 

इन विशाल वृक्षों में से एक विशाल एक पेड़ का नाम जनरल शरमन रखा गया है । २७२ फ़ीट ऊँचा और ७९ फ़ीट चौड़ा । यह ख़ूबसूरत पेड़ इतना बड़ा है की अगर इसे काटा जाए तो इससे इतनी लकड़ी मिलेगी जो ३५ कमरों का मकान बनाने के लिए पर्याप्त होगा ।

 

एक समय बोनसाई और जनरल शरमन एक ही आकार के थे जब वे बीज थे तो दोनो का वज़न एक औस के १/३००० हिस्से से भी कम था । परिपक्व होने पर आकार में अंतर बहुत अधिक है , परंतु इस आकार में अंतर के पीछे की कहानी जीवन के लिए एक सबक़ है ।

जब बोनसाई पेड़ ने ज़मीन से अपना सर ऊपर उठाया तो जापानियों ने उसे मिट्टी से खिंचा और उसकी जड़ को व पोषक जड़ों को रस्सी से बाँध दिया ।




इस तरह जान-बूझकर उसकी वृद्धि में रुकावट डाल दी । परिणाम हुआ : लघु आकार – ख़ूबसूरत पर लघु आकार ।
जनरल शरमन का बीज कैलिफ़ोर्निया की उपजाऊ ज़मीन में पड़ा और खनिजों , बारिश और धूप से पोषित हुआ । परिणाम हुआ : विशाल वृक्ष ।

 

ना तो बोनसाई और ना ही जनरल शरमन को अपनी नियति का चुनाव करना उपलब्ध था पर आपको है ।

आप चाहे जितना छोटे हो सकते हैं चाहे जितने बड़े । आपकी आत्म-छवि , जिस तरह से आप स्वयं को देखते हैं – निर्धारित करेगी की आप कैसे होंगे । चुनाव आपका है ।




positive shareing
0Shares

सोंच आपकी ज़िन्दगी बदल सकती है ।

सोंच आपकी ज़िन्दगी बदल सकती है

कोई आदमी अपने बारे में जो सोंचता है , उसी से उसकी तक़दीर तय होती है , या उसके भाग्य के बारे में संकेत मिलता है ।

सोंच आपकी ज़िन्दगी बदल सकती है

कड़वे प्रवचन

एक भिखारी एक स्टेशन पर पेंसिल से भरा कटोरा लेकर बैठा हुआ था । एक युवा अधिकारी उधर से गुज़रा और उसने कटोरे में एक डॉलर डाल दिया , लेकिन उसने पेंसिल नहीं ली । उसके बाद वह ट्रेन में बैठ गया । डिब्बे का दरवाज़ा बंद होने ही वाला था की अधिकारी एकाएक ट्रेन से उतर कर भिखारी के पास लौटा और कुछ पेंसिल उठा कर बोला ” मैं कुछ पेंसिलें लूँगा । इनकी क़ीमत है , आख़िरकार तुम एक व्यापारी हो और मैं भी । उसके बाद वह तेज़ी से ट्रेन पे चड़ गया ।


छह महीने बाद , वह अधिकारी एक पार्टी में गया । वह भिखारी भी वहाँ सूट और टाई पहने हुए मौजूद था । भिखारी ने उस अधिकारी को पहचान लिया , उसके पास जाकर बोला , ” आप शायद नहीं पहचान रहे हैं , लेकिन मैं आपको पहचानता हूँ । उसके बाद उसने छह महीने पहले घटी घटना का ज़िक्र किया । अधिकारी ने कहा , तुम्हारे याद दिलाने पर मुझे याद आ रहा है कि तुम भीख माँग रहे थे । तुम यहाँ सूट और टाई में क्या कर रहे हो ?

भिखारी ने जवाब दिया , आपको शायद मालूम नहीं की आपने मेरे साथ सम्मान से पेश आए । आपने कटोरे से पेंसिलें उठा कर कहा की इनकी क़ीमत है , आख़िरकार तुम भी एक व्यापारी हो और मैं भी । आपके जाने के बाद मैंने सींच , मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ? मैं भीख क्यूँ माँग रहा हूँ ? मैंने अपनी ज़िंदगी को सवारने के लिए कुछ अच्छा काम करने का फ़ैसल किया । मैंने अपना झोला उठाया और काम करने लगा । आज मैं यहाँ मौजूद हूँ । मुझे मेरा आत्मसम्मान लौटाने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ । उस घटना ने ने मेरा जीवन बदल दिया ।

दोस्तों ,

भिखारी की ज़िंदगी में क्या बदलाव आय ? बदलाव यह आया की उसका आत्मसम्मान जग गया और उसके साथ उसकी कार्यक्षमता भी बड़ गई । हमारी भी ज़िंदगी में आत्मसम्मान इसी तरह जादुई असर डालता है ।

positive shareing
0Shares

भौंरा की कहानी

भौंरा की कहानी साबित कर देगी क़ुदरत ने लाख कमियाँ हमारे अंदर दी हैं बावजूद उसके सफल हो सकते हैं । कुदरत ने भी हमारा हौसले को बढ़ाने के लिए हमारे आस-पास बहुत से क्लू छोड़ें जिस से हम प्रेरणा पाकर हम जिंदगी में आगे बढ़ सकें और सफल हो सकें।

ये बात आप भी जानते हैं हम इंसान न ही पंछी की उड़ सकते हैं ना ही चीते की स्पीड से दौड़ सकते हैं ना ही बाघ की तरह ताकतवर हैं फिर भी इंसान आज अपने दिमाग की वजह से कई हजार की स्पीड से उड़ सकता है बाघ की तरह ताकतवर तो नहीं लेकिन इतना ताकत है की वो पहाड़ का सीना चीर के वो अपने लिए रास्ता तैयार कर सकता है।

हमेशा याद रखें आप कर सकते हैं जो चाहे , आप सफल होने के लिए ही बने हैं।

 

आप में सारे वो गुण मौजूद हैं जो सफल लोगों में होता है बस आपको उस समय अपने आपको सफल मानना होगा जब दुनिया आप पर विस्वास नहीं कर रही हो।

भौरें की कहानी

भौंरा

हमे कुदरत  से  सिखने की जरुरत है। बैज्ञानिकों के मुताबिक भौरें का सरीर काफी भरी है और उड़ने के लिहाज से पंखों का फैलाओ काफी काम होता है। उड़ान के नियम के अनुसार , भौरां कभी उड़ नहीं सकता लेकिन उसको इस बात की खबर नहीं है और वह उड़ता रहता है।


लेकिन आप समझने की कोसिस करें जब आपको लोग प्रूफ देते हैं की आप सफल नहीं हो सकते हैं क्योँकि आपके अंदर कमियों का भण्डार है तो क्योँ हम उनकी बात को मान लेते हैं ?

आप भी भौरें की जैसे ही उड़ सकते हैं आपके लिए खुला आसमान है कोई रोक नहीं सकता है आपको। वो जो आपको अभी गलत साबित करने की कोसिस कर रहा है वो खुद जब आप कल सफल हो जायेंगे तो आपको सलाम करेंगें।

 

उम्मीद है आपको मेरा आज का यह पोस्ट भौंरा की कहानीपसंद  आया होगा तो प्लीज अगर आपको अच्छा लगा हो तो शेयर करना न भूलें।

धन्यवाद दोस्तों।

positive shareing
1Shares

साधु की जिद्द

ये कहानी है साधु की जिद्द की वो अपने जिद्द के वजह से कैसे मर जाता है ।

साधु की जिद्द

 एक गांव में एक साधु रहते थे और उनका भगवान पे अटूट विस्वास था। एक बार गाओं में भयंकर बारिश हुई और बढ़ते हुए पानी को देखकर गांव वाले सुरक्षित स्थान पे जाने लगे। लोगों ने उस साधु को सुरक्षित स्थान पे चलने को कहा , लेकिन साधु ने यह कहकर मन कर दिया की तुमलोग जाओ मुझे मेरे भगवान पर भरोषा है , वे मुझे बचाने आएंगे।

धीरे-धीरे पूरा गांव पानी से लबालब हो गया और साधु के घुटनों तक पानी आ गया तभी एक गाड़ी आई और उसमें सवार व्यक्ति ने साधु को गाड़ी में आने के लिए कहा लेकिन साधु ने यह कहकर मना दिया – मुझे तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं , मुझे मेरा भगवान  बचाने आएगा , गाड़ी वाला वहां से चला गया। पानी बढ़ने लगा ,

तभी एक नाव आई और बचावकर्मी ने कहा की जल्दी से आइये मुनिवर , मैं आपको सुरक्षित स्थान पे मैं आपको छोड़ देता हूँ। साधु ने कहा की मेरे भगवन मुझे बचाने जरूर आएंगे , तुम यहाँ से चले जाओ , बचाव कर्मी ने कहा गुरुवर मुझे अन्य लोगों को भी सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना है , आप समय बर्बाद मत कीजिये , जल्दी आइये ,

लेकिन साधु ने अपनी जिद्द नहीं छोड़ी। आख़िरकार वह नाव वाला अन्य लोगों को बचने के लिए वहां से चला गया। कुछ ही देर बाद साधु बाढ़ में बाह गए और उनकी मृत्यु हो गई। मरने के बाद साधु जब स्वर्ग पहुंचा तो उन्होंने भगवान से कहा कि हे भगवान मैंने कई वर्षों तक कड़ी तपस्या की और आप पर इतना विस्वास किया। लेकिन आप मुझे बचने नहीं आये।

भगवान ने कहा मैंने तुम्हे बचाने एक बार नहीं बल्कि तीन बार प्रयत्न्न किया। तुम्हे क्या लगता है की तुम्हारे पास लोगों को , गाड़ी को और नाव को किसने भेजा ?

सीख – भगवान उसी की मदद करता है जो अपनी मदद करता है।

असफलता केवल दो तरह की होती है –

पहली असफलता अवसर को न पहचानना है और दूसरी

असफलता अवसर को पहचानने के बाद भी प्रयास न करना

उम्मीद करता हूँ की आपको ये मेरा आज का पोस्ट साधु की जिद्द पसंद आया होगा ।

positive shareing
0Shares