करसनभाई पटेल

करसनभाई पटेल

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निरमा वाशिंग पाउडर जैसी लोकप्रिय ब्रांड के सर्जक करसन भाई पटेल का जन्म 1945 में गुजरात के महेसाणा जिले के रूपपुर गाँव में हुआ था। किसान परिवार के करसन भाई पटेल रसायन के विषय में बीएससी करने के बाद लाल भाई ग्रुप की न्यू कॉटन मिल्स  में लैब टेक्निसियन के रूप में नौकरी की। 1961 में वे सरकार के खनिज और भू-स्तर विभाग से भी जुड़े।

 

करसनभाई पटेल भू- विभाग से शेष समय अपने घर में अपने रसायन के ज्ञान का इस्तेमाल करके डिटर्जेंट पाउडर बनाना सुरु किया। पाउडर को पैक करके अपनी पुत्री के नाम से निरमा ब्रांड का वाशिंग पाउडर बेचना सुरु किया। घर में पाउडर बनाना और उसे प्लास्टिक में पैक करना और उसे साइकिल से निकल जाते थे उसे बेचने के लिए। ये सभी काम वो नौकरी करने के बाद बचे समय में करते थे। 

बाजार में सिर्फ सर्फ वासिंग पाउडर 9 रुपये प्रति किलो के दाम से बिकता था तब वे निरमा वासिंग पाउडर सिर्फ तीन रुपये प्रति किलो के भाव से बेचने लगे। उनका वाशिंग पाउडर दाम कम होने के साथ असरदार था। इसलिए वे वासिंग पाउडर की जितने भी थैलियां बनाते थे सभी बिक जाती थी। एक बार पप्रयोग करने के बाद गृहणियां बाद में और मांगती थी दुबारा खुद से। 

 

कुछ समय में ही करसन भाई को विस्वास हो गया की उनका पाउडर चलेगा जरूर। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर अहमदाबाद में फैक्ट्री और दूकान के लिए जगह प्राप्त करने का निर्णय किया।  पिता के जब्बरदस्त विरोध के बाद भी करसनभाई पटेल ने अपने पिता के शब्दों में पागलपन कहलाने जाने वाला सहस सुरु किया था। यहाँ पर भी आरम्भ साइकिल से ही हुआ था। 

 

करसनभाई पटेल ने अपने रसायन के ज्ञान को काम में लगाकर खोज लिया की अलग-अलग विस्तार में पानी की खराश के मुताबिक पाउडर के रसयानों को बदल कर ही उसे अधिक असरदार बनाया जा सकता है। 

 

इसलिए उन्होंने हर राज्य और क्षेत्र के लिए अलग-अलग फार्मूला बनाया। गुजरात का पाउडर महाराष्ट्र में बेचेंगे तो कपडे उतने अच्छे नहीं धुलेंगे ,इसलिए हर राज्य के पाउडर का स्टॉक बड़े ध्यान से अलग रखा जाता था। 

 

देखते-देखते करसनभाई पटेल का निरमा पाउडर सबसे अच्छे सर्फ पाउडर से भी अधिक बिकने लगा। बस इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कम मुनाफा ,ज्यादा व्यापार ,उत्तम क़्वालिटी और ग्राहकों की जरुरत की समझ-यह तीन सिद्धांत करसनभाई पटेल की सफलता के मुख्य कारण हैं। 

 

 

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MR BEAN

जाति से परे

अशराफुल आलोम 

इंसान जो सोंचता है वही बन जाता है

 

 

आज निरमा 350 करोड़ की कंपनी है,वह अनेक उत्पादों को बनाती है और निरमा युनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलजी भी चलाती है। 

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सर्गे ब्रिन और लेरी पेइज

सर्गे ब्रिन और लेरी पेइज

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सर्गे ब्रिन और लेरी पेइज-गूगल आज विश्व का अव्वल नंबर का वेब सर्च एंजन है। इंटरनेट पर  ढूंढने के लिए हम जिस प्रोग्राम का उपयोग  करते हैं,उसे सर्च एन्जिन कहते हैं। विश्व के 43 प्रतिसत लोग गूगल का इस्तेमाल करते हैं।

 

किन्तु सर्गे ब्रिन और लेरी पेइज नाम के दोस्तों ने गूगल बनाया तब उसे बेचने के लिए यह दोनों मित्रों ने महीनों तक बड़ी-बड़ी कंपनियों का संपर्क लिया था लेकिन किसी भी कंपनी ने उसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई।

 

सर्गे और लेरी जब इंटरनेट पर कुछ ढूंढने के लिए बैठते थे। तब सबसे बड़ी कठिनाई समय की रहती थी। उस ज़माने  की गति बहुत मंद थी और सर्च एंजिन आपके टाइप किये हुए स्पेलिंग के मुताबिक ही पेज  निकालते थे। स्पेलिंग में अगर गलती हो तो गलत चीजों का ढेर इकठ्ठा कर देते थे।

 

वो एंजिन जो चीजें ढूंढ लाते थे वो सब अस्त-व्यस्त स्थिति में आती थी। इसी वजह से हमें हजारों पेज में से अपनी आवश्यकता के अनुसार पेज ढूंढने में समय गवाँना पड़ता था।

सर्गे और लेरी ने सर्च एंजिन में ऐसा सुधार किया की जैसे आप सर्च के बॉक्स में एक-एक अक्षर टाइप करते जायेंगे वैसे-वैसे उनमें  बनते हुए नाम बॉक्स निचे  दीखता जाये।

 

इसी वजह से आपको पूरा शब्द वाक्य टाइप करने की आवश्यकता ना रहे। सिर्फ उसे पसंद करके खोज सके। इस इंजिन को आपकी टाइप करने की पद्धति और उसके साथ पसंद किये हुए शब्दों से पता  था की आपको दरअसल क्या चाहिए।

 

बाद  हुई चीजों को आपकी आवश्यकता के अनुसार क्रम में रख देता है,जिससे आप अपना समय बचा सकें।

 

इस सर्च   एंजिन को खरीदने के लिए कोई राजी नहीं था,इसलिए दोनों मित्रों ने  स्वयं मिलकर,पैसे उधार लेकर,अपना पहला सर्च एंजिन बना लिया। उनका सर्च एंजिन हाल में सबसे लोकप्रिय है। 

 

आज यह दोनों मित्र अरबपति हैं और 40 साल कम उम्र वाले धनपतियों उनका द्वितीय स्थान है। फिलहाल सादगीपूर्ण जीवन जी रहे हैं। 

 

गूगल अपने कर्मचारियों  बेहतरीन कार्य वातावरण और विश्व में श्रेष्ट वेतन देती है। 

 

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उठना सीखो

इंसान जो सोंचता है वही बन जाता है।

 

 

उनका मुद्रालेख है-

अपने ग्राहकों को  अधिक से अधिक सुविधाएँ दें 

और नियंत्रण कम से कम रखें और अपने कार्य में श्रद्धा रखें।   

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आज के अनमोल विचार

भगत सिंह एक ऐसा नाम जो सुनकर हरेक भारतीय  गर्व से भर जाता है और खून में उबाल आ जाता है। एक क्रांतिकारी जिसने पूरी अंग्रेज सेना  हिला डाला। जिन्होंने हर एक भारतीय को जगा दिया । आज भी उनके सुविचार मनुष्य के हृदय में क्रांति भर देती है ।

 

 

भगत सिंह के विचार

भगत सिंह के विचार- जिंदगी तो अपने दम पर जी जाती दूसरों के सहारे तो सिर्फ जनाजे उठते हैं।

 

व्यक्तियों को कुचल कर आप उसके विचारों को नहीं मार सकते हैं। 

 

जो भी व्यक्ति विकास के खड़ा है उसे  हर एक  रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी ,उसमें अविश्वास करना होगा तथा उसे चुनौती देनी होगी। 

 

अगर मुझे सरकार बनाने का मौका मिलेगा तो किसी के पास प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं होगी सबसे पास काम होगा और  धर्म व्यक्तिगत चीज  होगी सामूहिक नहीं।

 

सरफ़रोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है ,देखना है अब जोर कितना बाजुए कातिल में है  

 

सच में इनके जैसे महामानव कभी- कभी जन्म लेते है । लेकिन आज के देश की हालत को देख कर उनकी आत्मा को भी तकलीफ़ होती होगी ।

 

सभी नेता भी अपने-अपने पेट भरने में लगे हैं ।आज देश आज़ाद होने के कई साल के बाद भी काला बाज़ारी, स्कैम, घोटाले से आज़ादी नहीं मिल पाई है । 

काश आज ज़िंदा होते हम सबके चहेते ,लोकप्रिय नेता भगत सिंह ।तो हमें ऐसा नहीं लगता है की देश की ये हालत होने देते । 

आज हम सभी चाहते हैं भगत सिंह होने चाहिए और जन्म लेने चाहिए पर पड़ोसी के घर में , अपने घर में नहीं । 

हम सभी चाहते हैं देश की गंदगी साफ़ होना चाहिए पर साफ़ करेगा कौन ? क्या हमें पहल नहीं करनी चाहिए ? 

अभी ऐश करने के दिन हैं 

दिन में १० सेल्फ़ी लो 
इन्स्टग्रैम पे ,फ़ेस्बुक पे लाइक गिनो मेरे २५ ज़्यादा हैं तुमसे ।
वहतसप्प स्टैटुस १० बार चेंज करो अभी तो खेलने कूदने के दिन हैं ।
पार्टी करो , दारू पीओ ।टी॰वी॰ देखो रोज ६ सात घंटे रोज ।यू टूब पर धिंचक पूजा के विडीओ देखो ।सो जाओ २ बजे  उठो ।
यही तो लाइफ़ है यार , सब लोग इसी लिए जीना चाहते हैं ना तो हम अभी ऐश कर रहे हैं ।
 
लोग पागल हैं carier बना रहे हैं मंत्र तो मुझे PTA चल गया है टेन्शन नहीं लेने का ।
फिर आप ३० के हो जाओगे । रोक नहीं पाओगे ।फिर दुनिया से जाने का समय हो जाएगा ।
 
 
जागो 
इंडिया 
जागो ।
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धीरूभाई अंबाणी 

16 वे साल में मैट्रिक पास करने के बाद यमन देश के ऐडन सहर में क्लर्क की नौकरी की और पेट्रोल भी भरने का काम किया था। वहां से 10 साल काम करने के बाद 1958 में मुंबई लौटे। मुंबई 15000 रुपये उधार लेकर मस्जिद बन्दर पर 300 SQUARE फ़ीट की ऑफिस से अपना व्यवसाय सुरु किया। 

 


धीरूभाई अंबाणी का विवाह कोकिला नाम की संस्कारी सुशिल महिला के साथ हुआ। उनके दो पुत्र और दो पुत्री है। दोनों पुत्रों में बड़ा मुकेश अंबाणी और छोटा अनिल अंबाणी। उन दोनों के पढाई में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी बाद में दोनों पुत्रों को व्यवसाय में शामिल कर लिया। 

 

वे सफल स्वप्नदृष्टा थे। जिन्होंने भारत की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडिया लिमिटेड की नीवं डाली।

 

धीरे-धीरे उन्होंने पेट्रो-केमिकल्स ,इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी ,एनर्जी पावर ,रिटेल टेक्सटाइल्स ,इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विसेज, कैपिटल मार्केटेड एंड लॉजिस्टिक में पदार्पण किया। इसी तरह से धीरूभाई अंबाणी ने जीरो से हीरो का विकास यात्रा सुरु की। शेयर बाजार को आम इंसान को आकर्षित करने का श्रेय श्री धीरूभाई अंबाणी को जाता है।


उनकी कॉंवेर्टिवल डिवेंचर की स्किम ने शेयर बाजार में लोकप्रियता के स्वर्णिम सिखर बैठा दिया। 1992 में उन्होंने रिलायंस कंपनी को सर्वप्रथम बना दिया। रिलायंस कम्पनी सर्वप्रथम ऐसी कम्पनी थी जिसने फ़ोर्ब्स मैगजीन 500 कंपनियों के लिस्ट में गौरवपूर्ण स्थान पाया। 


2000 की साल में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सर्वेक्षण और समीक्षा के अनुसार ग्रेटेस्ट क्रिएटर ऑफ़  वेल्थ इन द सेंचुरी के गौरव से धीरूभाई अंबाणी को सम्मनित किये गए।  

6 जुलाई 2002 में मुंबई की ब्रीच कैंडी अस्पताल में धीरूभाई अंबाणी  महामानव का देहांत हो गया। उनके जीवन ज्योत परम ज्योत में विलीन हो गई। 

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उठना सीखो

 

 

QUOTES OF DHIRUBHAI AMBANI –

 

बड़ा सोंचो ,तेज सोंचो ,आगे सोंचो ,आइडिआ पर किसी का एकाधिकार नहीं है। 

यदि आप दृढ़ संकल्प के साथ और पूर्णता के साथ करते हैं तो सफलता आपका पीछा पीछा करती है। 

जो सपने देखने की हिम्मत रखते हैं वो पूरी दुनिया को जित सकते हैं। 

समय सिमा में काम खत्म कर लेना काफी नहीं है ,मैं समय सीमा से पहले काम खत्म करने की उपेक्षा रखता हूँ। 

न शब्द मुझे सुनाई नहीं देता है। 

कठिन समय में भी अपने लक्ष्य का पीछा मत छोड़िये 

मेरी सफलता का राज मेरी महत्वकांक्षा अन्य पुरषों की इक्षा जानना है। 

अगर आप गरीबीमें  जन्म लेते हैं इसमें आपकी कोई गलती नहीं है पर यदी आप गरीबी 

में  मरते हैं तो आपकी गलती है। 

फायदे कमाने के लिए  न्योते की जरुरत नहीं होती। 

हम दुनिया को साबित कर सकते हैं की भारत एक सक्षम राष्ट्र है। हम भारतियों को प्रतियोगिता से दर नहीं लगता है। भारत उपलब्धियां प्राप्त करने वाला देश है। 

 

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MR BEAN- एक असाधारण कलाकार

आज के पोस्ट में मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति की कहानी बताने जा रहा हूँ जो आज के समय में भी जीवित मिशाल हैं उनके लिए जो जीवन में सफल तो होना चाहते हैं पर कुछ लोगों की बातें को सुनकर , कुछ रिजेक्शन पाकर वापस असफलता , निराशा वाली दुनिया में लौट आते हैं और वो भी एक zombie की तरह सब लोगों में निराशा का वाइरस फैलाने लगते हैं । आज की कहानी MR BEAN की ।




६ जनवरी १९५५ में उनका जन्म हुआ था । ऐट्किन्सॉन चार भाइयों में सबसे छोटे हैं , उनका जन्म England में consett , कंट्री Durham में हुआ था । उनका जन्म मिडल क्लास परिवार में हुआ था , उनके पिता जो की बहुत मेहनती किसान थे ।

सुरुआत से ही ऐट्किन्सॉन बहुत मेहनती थे । उनका मेहनत के दम पर आक्स्फ़र्ड यूनिवर्सिटी में अड्मिशन हुआ । जब वो आक्स्फ़र्ड में पड़ रहे थे तो उनका रुझान ऐक्टिंग के तरफ़ हुआ , और उन्होंने एक कॉमडी ग्रूप में अड्मिशन करा लिया ।




अड्मिशन तो उन्होंने ले लिया लेकिन वो अच्छे से परफ़ोर्म नहीं कर पा रहे थे क्यूँकि बोलने में असमान्य थे ।

वो औरों की तरह बोल नहीं पाते थे ।वो अटक- अटक कर बोलते थे । उन्होंने ऐक्टिंग में कैरीअर बनाना चाहा पर उन्हें रिजेक्शन मिली । कई टीवी शोज़ ने रेजेक्ट किया उन्हें । इतना मेहनत करने के बावजूद उन्हें कोई सफलता हाथ नहीं लग पा रही थी पर उन्हें अपने आप पर विश्वास था । पर कुछ ही समय बाद उन्हें अहसास हुआ कि जब वो कुछ किरदार निभाते हैं तो उनकी बोलने की कठिनाई दूर हो जाती है । उस किरदार को निभाने के दौरान अच्छे से बोल पाते हैं ।

लेकिन अभी भी उन्हें रिजेक्शन ही मिल रही थी । क्यूँकि उनके पास कोई हीरो जैसा दिखने वाला चेहरा नहीं था और ना ही हीरो वाला शरीर । लेकिन उन्होंने सबको ग़लत साबित कर दिया । उन्होंने अपना एक शो बनाया और वो पूरे संसार में उस शो ने सफलता की नई ऊँचाई को छुआ उस शो का नाम – मिस्टर बीन ( Mr Bean ) । बहुत ही लोकप्रिय टीवी शो बना ।

आज रोअन ऐट्किन्सॉन सबसे लोकप्रिय अभिनेता में गिनती होती है । आज वो सबसे प्रसिद्ध कलाकार हैं । आज उनके पास १३२ मिल्यन डॉलर की सम्पत्ति है ।

इनकी कहानी हमें सिखाती है की हीरो जैसा शरीर या हीरो जैसा चेहरा नहीं होने के बावजूद अपने आत्मविस्वास की वजह से सफल हो सकते हैं ।




इस दुनिया में सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण है आपका ख़ुद का आत्मविस्वास और आपका अथक प्रयास , मेहनत । अपने आप पर तब विश्वास करना है जब दुनिया आपको रेजेक्ट कर रही है । हमें उस समय विश्वास करना होता है ख़ुद धन्यवाद दोस्तों , उम्मीद है आपको आज ये पोस्ट पसंद आया होगा । अगर आपको हमारा ये पोस्ट अच्छा लगा तो शेयर और लाइक करना ना भूलें ।

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कार्लोस स्लीम हेलु

आज मैं एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे बात करने जा रहा हूँ ,जिनसे आप बहुत कुछ सिख कर अपने जीवन को और ज्यादा सुहाना बना सकते हैं जिनका नाम है कार्लोस स्लीम हेलु।

KADVE PRAVACHAN ,KARLOS

FILE PICYURE

लोग मुझे किस तरह से याद करेंगे यह सोंचकर मैं नहीं जीता हूँ। जिस दिन औरों के अभिप्राय के अनुसार आप जीना सुरु करोगेउसी दिन आपकी मृत्यु निश्चित समझो।

 

 

उपर्युक्त अभिप्राय विश्व के सबसे अमीर आदमी कार्लोस स्लीम हेलु का है। उनका जन्म 28 जनवरी 1940 में मैक्सिको में हुआ था। आज वे 220 कंपनियों के मालिक हैं उनमें टेलीकम्यूनिकेशन , बैंक ,रेल्वे और होटल्स उनके मुख्य व्यवसाय हैं। आप मैक्सिको के सफर पर जाये और कार्लोस की किसी भी कंपनी का आपके खर्चे में से मुनाफा न हो ,ऐसी सम्भावना बहुत कम है। इसलिए लोग मिस्टर मोनोपोली के लाडले नाम से पहचानते हैं।



द न्यूयोर्क टाइम्स कंपनी जब नुकसान कर रही थी तब कार्लोस ने 250 मिलियन डॉलर की लोन देकर कंपनी को बदनामी से बचाया था।

मैक्सिको की जी.डी. पी. के करीब 7 प्रतिसत के मालिक हैं यदि बिल गेट्स को अमेरिका जी.डी .पी. के सात प्रतिसत डॉलर इकट्ठे करने हों तो उन्हें 101 मिलियन डॉलर इकट्ठे करने पड़ेंगे।

 

वे छह संतानों के पिता हैं लेकिन उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो चूका है। उन्होंने बैचलर ऑफ़ आर्ट्स और साइंस की डिग्री ली है। विश्व के सबसे बड़ी धनिक सख्सियत होने के वावजूद भी वे 6 बैडरूम के 30 साल पुराने घर में रहते हैं।

उनका बैडरूम मैनहटन की कोई भी होटल जैसा ही है। दरअसल वे लेबनान के हैं। अपहरण के अधिक किस्से मैक्सिको में बनते हैं ,फिर भी वे खुद अपनी गाड़ी चलकर ऑफिस जाते हैं। आज वे 74 अरब मिलियन डॉलर के मालिक हैं।
वे अपना स्वाथ्य का भी ख्याल रखते हैं। इतनी व्यवसायिक व्यस्तता के बिच में भी वे बेसबॉल खेलने के समय निकलते हैं।

 

धन्यवाद दोस्तों,

 उम्मीद करता हूँ की आपको ये पोस्ट मेरा पसंद आया होगा। इसे मैंने लिया डॉ जितेंद्र अढ़िया जी के किताब धनवान तो बनना ही चाहिए से।



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जाति से परे

सामाजिक उद्दमी जो कमाई तो करते हैं , लेकिन मात्र मुनाफ़ा कामना ही मक़सद नहीं होता । यह उद्दमियों की नई पिड़ी है , अच्छा करने का नया मॉडल, जो मात्र चैरिटी नहीं है ।

kadve pravacahn

file picture

 

जाति से परे-   



लोग आजकल आरक्षण के नाम पर तो कभी जात – पात के नाम पर आये दिन हड़ताल तो कभी दंगे पर आज ऐसे व्यक्ति के बारे बात कर रहा हूँ जो साधारण होते हुए भी आसाधारण व्यक्ति की कहानी , लिक से हटकर की कहानी –


विंदेश्वर पाठक- सुलभ इंटरनैशनल

 

बचपन-

बचपन में जब अनजाने में किसी अछूत को छू दिया था , तो उनकी दीदी ने उनकी शुद्धि के लिए उन्हें गाय का गोबर खिलाया था । उसी ब्राह्मण लड़के ने आगे चलकर सुलभ आंदोलन का नेतृत्व किया । टॉयलेट क्रांति और कभी उन्हें साफ़ करने वालों को समाज में सही जगह दिलाने में ।

 

बिंदेश्वरी जी का जन्म बिहार के वैशाली जिले के रामपुर बाघेल गाँव में हुआ । ये ऐसे परिवार से थे की एक बार उन्होंने एक नीची जाती के  व्यक्ति को छू लिया था तो उनके दादी जी ने सुद्ध करने के लिए गोबर खिलाया था ।  में जन्म लिए थे पर इनको जात-पात पर बिस्वास नहीं था । वे हमेशा से जाटपत के ख़िलाफ़ रहे ।

 

चैलेंज –

 

उनके पिता उनसे नाराज रहते ! ब्राह्मण समुदाय मजाक उड़ाते थे – हाँ भाई भंगी जी , भंगी जी आइये , भंगी जी जाइये। हमने सुना है इन दिनों आप भंगी का काम कर रहे हैं । उनकी बीवी के अलावा , हर इंसान इनके खिलाफ था।  लेकिन जब वो सफल हुए वह सब वापस आ गए। समय के हिसाब से नजरिया भी लोगों का बदलता है।

मिसन- 



ज़िंदगी में पाँच चीज़ें ज़रूरी है : विजन, मिसन , प्रतिबद्धता, योग्यता और क्षमता । एक बड़े सफल विचार के लिए आपको इन पांचों को एक साथ लाना होता है। बच्चे गेम खेलते हैं , मिठाई कहते हैं , क्रिकेट देखते हैं फिल्म देखते हैं माल में घूमते हैं। लेकिन हमारे देश में आज भी ऐसे बच्चे हैं जो टॉयलेट साफ करते हैं , कर रहे हैं। आज भी बचपन ऐसे ही गुजार देते हैं ,आज भी काम बाकि है बहुत काम करना है ! हमारा आंदोलन  है अछूतों के लिए सम्मान और मानवीय अधिकारों की बहाली। और उन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल करना।

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एक लड़की की जीवन बदल देने वाली कहानी

एक लड़की की जीवन बदल देने वाली कहानी

 

जन्म – जून 23 , 1940

मृत्यु-नवंबर 12 ,1994

निकनेम- स्किटर

एक लड़की की जीवन बदल देने वाली कहानी – विल्मा रुडोल्फ का जन्म टेनेसी के एक गरीब परिवार में हुआ था। चार साल की उम्र में डबल निमोनिया और  काला बुखार ने गंभीर रूप से बीमार कर दिया था।  इसकी वजह से पोलियो हो गया। वह पैरों को सहारा देने के लिए ब्रेस पहना करती थी। डॉक्टरों ने तो यहाँ तक कह डाला था की वह जिंदगी भर चल फिर नहीं सकेगी। लेकिन विल्मा की माँ उसकी हिम्मत बड़ाई और कहा की भगवान की दी हुई छमता ,मेहनत  और लगन से वो जो कर सकती है।




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 यह सुनकर विल्मा ने कहा वह दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती है।  नौ साल की उम्र में डॉक्टरों के मना करने के वावजूद विल्मा ने ब्रेस को उतर फेंका और उसने पहला कदम उठाया , जबकि डॉक्टरों ने कहा था की वह कभी नहीं चल पायेगी 13 साल की उम्र होने पर उसने अपनी पहली दौड़ प्रतियोगिता मरण हिस्सा लिया और सबसे पीछे रही। उसके बाद दूसरी ,तीसरी ,चौथी दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही और हमेसा आखरी स्थान पर आती रही और सबसे पीछे रही।  वह तब तक कोसिस करती रही जबतक की वह दिन नहीं आ गया।  जब वह फर्स्ट आई।

 

15  साल की उम्र में विल्मा टेन्नेस्सी स्टेट यूनिवर्सिटी गई। जहां वह एड टेम्पल नाम के कोच से मिली। विल्मा ने ख्वाहिस बताई की मैं दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती हूँ।

तब टेम्पल ने कहा तुम्हारी इक्षाशक्ति  की वजह से तुम्हे कोई नहीं रोक सकता और मैं तुम्हारे साथ हूँ मैं भी तुम्हारी मदद करूँगा

 

आखिर वह दिन आ ही गया जब विल्मा ने ओलिंपिक में हिस्सा लिया। ओलिंपिक में दुनिया के सर्वश्रेष्ट खिलाडियों से मुकबला होता है विल्मा का मुकबला जुटता हैन से था ,जिसे कोई भी हरा नहीं पाया था।  पहली दौड़ 100 मीटर की थी।  इसमें विल्मा ने जुत्ता को हरा कर पहला गोल्ड मेडल जीता। दूसरी दौड़ 200 मीटर की थी।  इसमें विल्मा ने जुत्ता को दूसरी बार हराया और दूसरा गोल्ड मेडल जीता। तीसरी दौड़ 400 मीटर रिले रेस की थी विल्मा का मुकबला फिर से जुत्ता से ही  था।

 

रिले में रेस के आखरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथिलीट ही दौड़ता है इसलिए विल्मा और जुत्ता , दोनों अपनी-अपनी टीमों के लिए दौड़ आखरी हिस्से में दौड़ना था विल्मा की टीम में तीन लोग रिले रेस के सुसुआती बेटन तीन हिस्से में दौड़े और आसानी  से बेटन बदली।

जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई , तो  उसके हाथ से बेटन ही छूट गया। लेकिन विल्मा ने देख लिया की दूसरे छोर पे जुत्ता हैन तेजी से दौड़ चली है।  विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठाई और मशीन की तरह ऐसी तेजी से दौड़ी की जुत्ता  तीसरी बार हराया और अपने नाम तीसरा गोल्ड मैडल जीता।

यह बात इतिहास के पन्ने पे दर्ज हो गई की एक लक्वाग्रस्त महिला 1960  के ओलिंपिक में दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गई।

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शिक्षा – विल्मा की कहनी से क्या सीखना चाहिए ? इससे हमें शिक्षा मिलती है की कामयाब लोग कठिनाइओं के वावजूद सफलता हासिल करते हैं , न की तब जब कठिनाइयां नहीं होती है।




एक लड़की की जीवन बदल देने वाली कहानी आज का ये पोस्ट आपको पसंद आया होगा । धन्यवाद ।

 

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Arnold Alois Schwarzenegger

 Arnold Alois Schwarzenegger-आज के पोस्ट में ऐसे व्यक्ति विशेष के बारे में मैं बताने जा रहा हूँ , जिन्होंने लीक से हटकर काम किया और आज वो सफलता की नई ऊँचाई पर हैं , आज वो कइयों के रोल- मॉडल हैं। मिस्टर अर्नोल्ड स्वरजेनेगर

उनका जन्म 30 जुलाई 1948 को हुआ था । उनके पिता एक पोलीस ऑफ़िसर थे । अर्नोल्ड एक कथोलिक परिवार में पले-बड़े । जो की हर रविवार को मास ( Mass) अटेंड करते थे । जब वो छोटे थे तो कई गेम खेलते थे । लेकिन पहली बार उन्होंने बारबेल को पकड़ा था 1960 में जब उनकी आयु 15वर्ष की थी उनके फ़ुट्बॉल कोच लेकर गए थे पहली बार जिम ।

उनके पिता चाहते थे की अर्नोल्ड बड़े होकर एक पोलिस ऑफ़िसर बने और उनकी माँ चाहती थी बड़े होकर मेरा बेटा एक शिक्षक बने । उन्होंने कई बार अपने पिता से जिम जाने के कारण कई बार पिटे भी थे । वो अपने पिता से छुप-छुपाकर कर जिम जाया करते थे । वो अपने बायआग्रफ़ी में कहते हैं की ” जब मेरे पिता मेरे बाल को पकड़ कर खिंचते थे और अपने बेल्ट से मारते थे , तो मुझे बुरा नही लगता था और कभी नहीं लगा की बॉडीबिल्डलिंग छोड़ दूँ। वहीं मैं देखता हूँ और बच्चों को थोड़ा सा विरोध क्या होता है मम्मी- पापा या समाज का लोग अपने पैशन, शौक़ को छोड़ देते हैं । अगर मैं भी छोड़ देता जिम को आज जो हूँ वो कभी नहीं बन पाता । वो कहते हैं कभी भी ज़िंदगी में आपको कुछ पाना है तो आपको अपने लीक से हटकर चलना चाइए , अलग रास्ता चुनिए , अपना रास्ता ख़ुद बनाइए । अपने आप पर बिस्वास करें ।

वो १९७५ में आर्मी में भर्ती हो गए थे और आर्मी के सर्विस के दौरान ही वो मिस्टर युरोप ( जूनीयर ) का ख़िताब जीता । वो कई बार मिस्टर ओलम्पिया रहे । पहली बार जब उन्होंने मिस्टर ओलम्पिया में हिस्सा लिया 1969 में सेकंड पज़िशन रहे फिर उन्होंने 1980 में अगले साल ही प्रथम आए मिस्टर ओलम्पिया में । वो कई बार मिस्टर ओलम्पिया बने ।


वो पहली बार बॉडी- बिल्डिंग के लिए मोटिवेट हुए थे बड़े पर्दे मूवी के कारण सो उनकी वो मिस्टर ओलम्पिया बन्ने के बाद वो बड़े पर्दे पर अपना करियर बनाने के लिए निकल पड़े । उन्हें वहाँ पे बहुत रिजेक्शन का सामना करना पड़ा क्यूँकि इतना बड़े शरीर वाले के साथ कोई हेरोयन काम करना नहीं चाहती थी , आज तक कोई ऐसा हीरो नहीं बना था । कई डाइरेक्टर के पास गए सबने उनको सलाह दिया की आपका शरीर हीरो के लायक नहीं है और आपका आवाज़ भी हीरो की तरह नहीं है ।क्यूँकि उनकी आवाज़ बॉडीबिल्डिंग के कारण पूरी तरह बैठ गया था , और अजीब तरह से निकलता था ।
पर वो ज़िद्दी थे उन्होंने ठाना था की सबको ग़लत साबित करके रहूँगा , उन्होंने फिर मेहनत किया अपने आवाज़ और शरीर के अपर में । बहुत मेहनत , टूइशन लिया आवाज़ ठीक करने के लिए । और लगातार डाइरेक्टर से मिलते रहे और उनको रिजेक्शन मिलता रहा । आख़िरकार एक दिन उनको कामयाबी मिली 1990 में HERCULES मूवी में रोल मिला । और फिर उन्होंने पलट कर नहीं देखा आज वो दुनिया के सबसे महँगे फ़िल्मस्टार के रूप में जाने जाते है । उन्होंने अपना मुक़ाम बनाया ।
वो रिपब्लिक पार्टी से जुड़े और अमेरिका के एक शहर के मेयर भी बनें ।
आप कोई भी चीज़ पाने के लिए ठान लेते हैं तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने की साज़िश रचती ।
हिम्मत ना हारें और विरोध से ना डरें , प्राकृत अंततःन्याय करती ।

धन्यवाद दोस्तों ,
उम्मीद करता हूँ की आपको मेरा ये Arnold Alois Schwarzenegger पोस्ट  पसंद आया होगा । अगर अच्छा लगा हो तो प्लीज़ लाइक और शेयर करना ना भूलें ।

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हार के आगे जीत की कहानी

आज के पोस्ट में मैं हार के आगे जीत की कहानी है बहुत सारे जो आज सफल हैं कभी वो भी आपकी तरह असफल थे आप हिम्मत मत हारो क्यूँकि हर हार के आगे जीत की कहानी बाक़ी होती है आप ख़ुद इसे लिखें ।




होंडा – होंडा कंपनी के संस्थापक सोइचिरो होंडा ने जिंदगी के कई मोड़ पे असफलता देखी। उन्होंने जब टोयोटा कंपनी में इंटरव्यू दिया था तो उन्हें असफल घोसित किया गया था। वे गरीबी में पीला-बड़े ,पिता को साइकिल-रिपेयर की छोटी सी दुकान थी।

 

उन्हें कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी ,16 वर्ष की उम्र में वे टोकियो पहुंचे। वहां पे अप्रेंटिशिप के लिए आवेदन दिया ,उम्र एक वर्ष कम थी ,इसलिए उन्होंने कंपनी मालिक के घर में एक साल काम किया। बाद में एक साल कंपनी मालिक घर पे काम करने के वावजूद अप्रेंटिशिप भी न मिली।

 

  फिर निराश होकर गॉव पहुंचे। जल्द ही उन्होंने निराशा छोड़कर रिपेयरिंग की छोटी दूकान खोली। कई दिनों तक वहीँ काम किया आगे कुछ ही दिनों में कई पार्ट्स जोड़कर मोटरसाइकल बना दी। यह  मोटरसाइकल   की सबसे बेहतरीन मोटरसाइकल मणि गई थी। फिर इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

न्यूटन -किसी भी स्कूली छात्र के मुँह पहले वैज्ञानिक के तौर पर न्यूटन का नाम आता है। न्यूटन बचपन में ठीक से नहीं पद पाए थे। उनकी माँ ने दुरी सदी की थी इसलिए वे अकेलापन महसूस करते थे किसी तरह बी.ए.पड़ने मशहूर ट्रिनिट्री कॉलेज पहुंचे। काफी कोसिस की थी बी.ए. में लेकिन औसत नंबर ही आये। पास में पैसे नहीं थे

 

हॉस्टल में दूसरे छात्रों के लिए चाय-पानी पहुँचाने का काम किया ,पहले लॉ करना चाहा फिर दर्शन पड़ने लगे। बी.ए. के बाद दो साल तक घर में ही गणित पढ़े इसी बिच बगीचे में सेब गिरते देखा और दिमाग में गुरुत्वाकर्षण की बात आई। लेकिन इसे सिद्धांत का रूप दने में 20 साल लग गए। न्यूटन ने अपने जीवन में अनेक वैज्ञानिक खोज की।




रामानुज – रामानुज पहली से मेट्रिक पास हुए ,इसके बाद में बारहवीं की परीक्षा में दो-दो बार फेल हुए। फेल होने के कारण स्कॉलरशिप बंद हो गई। पास में पैसे नहीं थे पड़ने के लिए उन्होंने क्लर्क की नौकरी कर ली ,लेकिन उन्होंने घर में अध्यन करना नहीं छोड़ा।

 

कुछ ही दिनों बाद उन्होंने महान गणितज्ञ जिएच हार्डी को पेपर भेजा पेपर में 120 थ्योरम थे। इन्हे देख कैंब्रिज विश्वविद्यालय से बुलावा आया। इंग्लैंड में इन्हें फेलो ऑफ रॉयल सोसाइटी से सम्मनित किया गया। आगे उनके थ्योरम कई खोजो के लिए आधार बनें। जिस स्कूल में वो दो-दो बार फेल हुए थे ,उसी स्कूल का नाम रामानुज के नाम पर रखा गया।




लियोनार्डो द विन्ची-लियोनार्डो द विन्ची ने मोललीसा बनाने में 17 साल लगाए। ऐसा नहीं की उन्होंने ऐसा जान-बूझकर किया। वे डिस्लेक्सिया और एडीडी यानि अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर से पीड़ित थे। डिसक्लेसिया के कारण वे पड़ने-लिखने में कमजोर थे और एडीडी के कारण उनका ध्यान एक चीज पर केंद्रित नहीं हो पाता था।

 

इसी कारण वे अपनी 30 पेंटिंग पूरी नहीं कर पाए। शिक्षा केंद्र में मुर्ख छात्र माना गया। सब उन्हें सुस्त-कामचोर समझते थे। उन्हें क्लास  में पीछे बैठना होता ,लेकिन उन्होंने ठान राखी थी की चीजों को समझने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाएंगे बाद में चित्रकार, मूर्तिकार और इंजीनियर ही नहीं-शरीर विज्ञान के भी मास्टर बने। यहाँ तक की उन्होंने आज के हलोकॉप्टर की पहली डिजाइन भी तैयार की।

मिस्टर बीन -हमसब का चहेता करैक्टर मिस्टर बीन जब भी हँसे ,तब भी हंसी आती है और रोये तब भी। मीटर बीन का साली नाम रोवान एट्किंसन है। स्कूल में उन्हें मुर्ख समझा जाता था। पड़ने में मन नहीं लगता था। बस केवल उट-पटांग हरकते करते थे। बच्चे ही नहीं ,टीचर्स भी उनकी हंशी उड़ाते थे ,वे पढ़ाई के दौरान अपने ही दुनिया में खोये हुए रहते थे।

 

उनकी शक्ल और हरकतों को देखकर सभी एलियन कहकर मजाक उड़ाते थे। बाद में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी गए वहां पे भी उनका लोग मजाक उड़ाते थे। वहां पे उन्होंने पहली बार थियेटर ज्वाइन किया और लगातर कोसिस करने के बाद उनको थियेटर में एक ऐसा रोल मिला जो गूंगा था और चूंकि बोलने में हकलाते थे लेकिन इस किरदार को उन्होंने शानदार तरीके से निभाया और खूब तालियां बटोरी। इसके बाद वे पीछे मुड़कर नहीं देखे।





मुझे उम्मीद है दोस्तों की आपको आज का ये पोस्ट हार के आगे जीत की कहानी पसंद आया होगा ।

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रियल हीरो की कहानी


बचपन से एक ही बात-एक ही बात बेटे पैसे पेड़ पे नहीं उगते हैं । ग़लती से एक पेंसिल भी टूट जाता था तो एक ही रिपीटेड ड़ाइलोग पेंसिल टूटा कैसे क्या तुम्हें पता नहीं है की कितना मेहनत करके पैसे मैं कमाता हूँ और तुमको अहमियत ही नहीं है पैसे का । बात बात पे एक बात ही सुनने को मिलता था पैसा पेड़ पे नहीं उगते , पैसे पेड़ पे नहीं उगते ।सुनने मिलता था शयद आपको भी यही सुनने को मिलता हो और बचपन से ही यह अहसास कराया जाता है हमें की पैसा कामना बहुत मुश्किल है।

 

लेकिन जब आप थिंक एंड ग्रो रीच किताब को पड़ने के बाद आप बोलेंगे की हाँ पैसे पेड़ पे ही उगते हैं बस वो पेड़ आपके दिमाग़ में उगने चाइए । एक बार जब आपके विचार बन जाते हैं तो आपके लिए पैसे पेड़ पे ही उगते हैं ।

 

अशराफुल आलोम बांग्लादेश में बोगरा जिले के इकलिया गांव में पैदा हुआ. बाप ‘चनाचूर’ (खास तरह का नमकीन मिक्सचर) बेचा करते थे. महज 10 साल का था, तभी उसके बाप ने दूसरी शादी कर ली. और छोड़ दिया उसको

उसकी मां के साथ. वो जिंदा रहा. अपनी मां के लिए और तुम जैसे लोगों की सोच को धिक्कारने के लिए. 10 साल के बच्चे का संघर्ष शुरू हुआ. मां का सहारा बना और चनाचूर बेचने लगा. गरीबी और मेहनत ने पढ़ाई पर ब्रेक लगा दिया. वो सातवीं के इम्तिहान में फेल हो गया और स्कूल छुट गया. लेकिन अपनी किस्मत को नहीं हारने दिया.



एक दिन उस शॉप के मालिक ने उस शॉप को बेचने का मन बना लिया. अशराफुल ने उससे कहा, ‘ये दुकान मत बेचो मैं चला लूंगा, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं. मैं तुम्हें इंस्टालमेंट में देता रहूंगा.’ दुकानदार काफी मिन्नतों के बाद उसकी बात मान गया.

अभी वो 15 साल का भी नहीं था कि दो-दो बिजनेस चलाने लगा. हर सुबह घर से चनाचूर बेचने निकलता. और शाम होते ही वीडियो शॉप खोलकर बैठ जाता.जब भी खली समय मिलता था वो मूवी देखता था , उसका शौक़ था कि विडीओ बनाने का । फिर उसने एक गाने में काम किया और उस गाने ने उनकी ज़िंदगी बदल दी ।

जिससे उसके मन में भी हीरो बनने का विचार उत्पन्न हुआ । आज वह बांगला देश का superstaar है । लोग उसके औटोग्राफ के लिए मरते हैं । सिर्फ़ एक विचार ने ही असरफुल आलोम की आज ज़िंदगी को सफलता से भर दिया ।




असरफुल आलोम जब हीरो बन सकता है एक सूपर स्टार बन सकता है तो मैं बिलकुल कह सकता हूँ कोई कुछ चाह ले दिल से तो भी जो चाहे बन सकता है ।डाइमंड (Diamond) बनना तो छोटी सी बात है ।

धन्यवाद दोस्तों , उम्मीद है कि आपको ये मेरा आज का पोस्ट पसंद आया होगा प्लीज़ लाइक एंड शेयर करना ना भूलें ।



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